बत्तखाव (कंबोडिया), विशेष संवाददाता:
सीमा पर भड़के ताज़ा संघर्ष ने हजारों ज़िंदगियों को अस्त-व्यस्त कर दिया है। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच डांगरेक पर्वतमाला में स्थित प्राचीन मंदिरों के इलाक़े में हाल ही में पांच दिन तक चला युद्ध भले ही थम चुका हो, लेकिन इसकी चोट अब भी लोगों के दिल और घरों पर साफ़ देखी जा सकती है।
बत्तखाव प्राथमिक विद्यालय के अस्थायी शिविर में होंग स्रे रिथ अपने आठ दिन के शिशु लिन काकादा को सीने से लगाए बैठी हैं। यह बच्चा तब पैदा हुआ जब उसकी मां संघर्ष से जान बचाकर भाग रही थी। रास्ते में ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई और राहत शिविर पहुंचने पर उसने बच्चे को जन्म दिया। “मुझे नहीं पता था कि मैं और मेरा बच्चा सुरक्षित पहुंच पाएंगे या नहीं,” स्रे रिथ की आंखों में आंसू भर आते हैं।
पांच दिन की मुठभेड़, हजारों बेघर
डांगरेक की हरी-भरी पहाड़ियों में अचानक गोलियों और तोपों की गूंज ने शांति को चकनाचूर कर दिया। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा रेखा को लेकर विवाद ने तूल पकड़ा और पांच दिन तक लगातार गोलीबारी चली। कई ग्रामीण मारे गए, दर्जनों घायल हुए, और हजारों लोग अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेने पर मजबूर हुए।
शरण शिविरों में कठिन जीवन
स्थानीय प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय राहत संगठन भोजन, पीने का पानी और दवाइयां उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन शिविरों में भीड़, गर्मी और बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। बच्चों के लिए दूध और दवाइयों की कमी है।
“हम चाहते हैं कि लड़ाई खत्म हो और हम अपने घर लौट जाएं,” एक वृद्ध शरणार्थी कहती हैं, जो अपने गांव में खेत-बाड़ा छोड़ने को मजबूर हो गईं।
सीमा विवाद का कोई ठोस हल नहीं
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच यह सीमा विवाद नया नहीं है। प्राचीन मंदिर परिसर के स्वामित्व को लेकर दोनों देशों में दशकों से तनातनी रही है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रयास जारी हैं, लेकिन हालिया टकराव ने एक बार फिर दोनों देशों के रिश्तों में खटास पैदा कर दी है।
इस युद्ध में भले ही हथियार थम गए हों, लेकिन शरण शिविरों में बैठी हजारों आंखों में अब भी भय, थकान और अनिश्चितता का साया है। और इन्हीं के बीच, आठ दिन के लिन काकादा की मासूम मुस्कान उम्मीद की एक किरण बनकर चमक रही है।