नई दिल्ली, 29 अगस्त।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को आयोजित प्रेस वार्ता में कई अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने भाषा विवाद, जातिगत आरक्षण और प्रधानमंत्री–मुख्यमंत्री को हटाने से जुड़े प्रस्तावित बिल पर खुलकर विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि संघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अलग-अलग संगठन हैं और उनकी कार्यप्रणाली स्वतंत्र है।
हाल के दिनों में देश में भाषा को लेकर उठे विवादों पर भागवत ने कहा कि भारत की विविधता ही उसकी पहचान और ताक़त है। उन्होंने कहा कि किसी क्षेत्र या समाज पर किसी भी भाषा को थोपना उचित नहीं होगा। “हर क्षेत्र की भाषा का सम्मान होना चाहिए। मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही एकता मजबूत होगी,” उन्होंने कहा।
भागवत ने आरक्षण व्यवस्था पर बोलते हुए साफ कहा कि यह संविधान की देन है और समाज में संतुलन कायम करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा, “जब तक समाज में बराबरी नहीं आती, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के लिए बनी है और इसे राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।”
हाल ही में संसद में आए उस बिल पर भी भागवत ने प्रतिक्रिया दी जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को हटाने की प्रक्रिया में बदलाव का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा जनता की इच्छा है। “कोई भी व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे जनता की आवाज़ को दबाया जाए। जनता ही अंतिम निर्णायक है,” उन्होंने टिप्पणी की।
अपने संबोधन में भागवत ने संघ और भाजपा के रिश्तों पर भी बात की। उन्होंने कहा, “संघ और भाजपा वैचारिक रूप से जुड़े हैं, लेकिन दोनों स्वतंत्र संगठन हैं। भाजपा सत्ता में है तो उसके फैसले और नीतियां उसकी ज़िम्मेदारी हैं, संघ की नहीं।”
मोहन भागवत का यह संबोधन ऐसे समय आया है जब देश में भाषा नीति, आरक्षण और संवैधानिक ढांचे पर बहस तेज है। विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रहा है, वहीं संघ प्रमुख का यह बयान राजनीतिक हलकों में नए संकेत माना जा रहा है।