ऑस्ट्रेलियाई संसद के ऊपरी सदन में बुधवार को उस समय तनाव का माहौल पैदा हो गया जब लिबरल पार्टी की सीनेटर जैसिंटा नामपिजिन्पा प्राइस ने संघीय सरकार पर गंभीर और विवादित आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि सरकार विशेष समुदायों, खासकर भारतीय प्रवासियों को, केवल राजनीतिक लाभ और वोट बैंक मज़बूत करने के उद्देश्य से देश में ला रही है।
प्राइस, जो उस समय ऑस्ट्रेलियाई ध्वज ओढ़े हुए थीं, ने कहा कि सरकार का आप्रवासन कार्यक्रम संतुलित नहीं है और यह चुनिंदा समूहों को प्राथमिकता देता है। यह आरोप लगते ही संसद में हंगामा मच गया। विपक्षी सांसदों के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के कई सदस्यों ने भी इसे "निराधार, गैर-जिम्मेदाराना और समाज को बाँटने वाला बयान" करार दिया।
लेबर पार्टी के नेताओं ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रवासी नीति का संचालन पूर्णतः पारदर्शिता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने प्राइस के बयान को “राजनीतिक लाभ के लिए ग़लत सूचना फैलाने की कोशिश” बताया।
भारतीय प्रवासी समुदाय ने भी इस बयान पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। सामुदायिक संगठनों ने कहा कि भारतीय मूल के लोग ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और व्यापार जैसे क्षेत्रों में अपनी मेहनत और प्रतिभा से योगदान दे रहे हैं। उनका राजनीतिक एजेंडा से जोड़ना अपमानजनक है।
एक प्रवासी नेता ने कहा, “भारतीयों को वोट बैंक बताना न केवल भ्रामक है, बल्कि हमारी कड़ी मेहनत और उपलब्धियों का अपमान है। हम यहाँ इस देश के विकास में साझेदारी करने आए हैं, न कि राजनीति का औज़ार बनने।”
तेज़ आलोचना और बढ़ते दबाव को देखते हुए सीनेटर प्राइस ने बाद में अपने बयान से पीछे हटते हुए कहा कि उनके शब्दों को गलत संदर्भ में लिया गया है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि वह सरकार की आप्रवासन नीति पर सवाल उठा रही थीं, किसी खास समुदाय को निशाना नहीं बना रही थीं। हालांकि, उन्होंने औपचारिक रूप से अपने बयान को वापस ले लिया।
संघीय सरकार ने साफ़ कहा है कि ऑस्ट्रेलिया की आप्रवासन प्रणाली योग्यता आधारित है और इसमें किसी समुदाय को राजनीतिक उद्देश्य से प्राथमिकता नहीं दी जाती। प्रवक्ता ने कहा, “ऑस्ट्रेलिया की ताकत उसकी बहुसांस्कृतिक पहचान है। सभी प्रवासी समान रूप से अवसर और सम्मान पाते हैं।”
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद लिबरल पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। प्राइस पहले भी अपने बयानों को लेकर विवादों में रही हैं और इस बार प्रवासी समुदाय को लेकर उनके आरोपों ने पार्टी की छवि को धक्का पहुँचाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे बयानों से बहुसांस्कृतिक समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होता है और भारतीय समुदाय जैसे बड़े प्रवासी समूहों के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में जल्दबाज़ी में दिए गए बयान किस तरह समाज में ग़लत संदेश फैला सकते हैं। प्राइस का यह कदम न केवल उनकी साख पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की उस बहुलतावादी पहचान को भी चुनौती देता है जो दशकों से प्रवासी समुदायों के योगदान पर आधारित है।