बेंगलुरु, 20 सितंबर 2025
देश में निर्मित स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस की कतारें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के बेंगलुरु संयंत्र में तैयार खड़ी हैं। लेकिन इन विमानों को भारतीय वायुसेना तक पहुँचाने में देरी हो रही है। वजह है – अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) से इंजन आपूर्ति में बाधा।
एचएएल के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. डीके सुनील ने एनडीटीवी को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि मौजूदा बैच के सभी एयरफ्रेम तैयार हो चुके हैं, लेकिन इंजन न मिलने के कारण डिलीवरी टल रही है।
उन्होंने असेंबली हैंगर में कतारबद्ध तेजस जेट दिखाते हुए कहा –
"हम आपूर्ति के लिए पूरी तरह तैयार हैं, बस इंजन की कमी आड़े आ रही है।"
तेजस में लगने वाला जीई-404 टर्बोफैन इंजन 70-80 किलो न्यूटन तक थ्रस्ट देने में सक्षम है और उच्च-प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। मगर सप्लाई चेन की दिक्कतें भारतीय वायुसेना तक विमानों की समयबद्ध डिलीवरी में बड़ी बाधा बन रही हैं।
डॉ. सुनील ने साफ कहा –
"अगर हमारे पास अपना इंजन होता, तो इस अड़चन का सामना नहीं करना पड़ता। भारत को एक स्वदेशी जेट इंजन की तत्काल आवश्यकता है।"
एचएएल ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। वर्तमान में कंपनी दो इंजन डिज़ाइन कर रही है –
एक हेलीकॉप्टरों के लिए
दूसरा हॉक-श्रेणी के विमानों के लिए
इसके साथ ही, आगामी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) के लिए आवश्यक बड़े इंजन के विकास पर भी काम चल रहा है। डॉ. सुनील के अनुसार, अगले दस वर्षों में भारत के पास अपने जेट इंजन होने की पूरी संभावना है।
तेजस परियोजना की शुरुआत 1986 में हुई।
इसका पहला प्रोटोटाइप 2001 में उड़ान भर चुका था।
वर्तमान में भारतीय वायुसेना 38 तेजस विमानों का संचालन कर रही है।
आने वाले वर्षों में 200 से अधिक विमान सेना को मिलने हैं।