सिडनी। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (NSW) में हज़ारों घर ख़रीदार हर साल एक ऐसी चाल का शिकार हो रहे हैं, जिसमें उन्हें ऐसे घरों पर बोली लगाने को प्रेरित किया जाता है, जिन्हें वे असल में खरीद ही नहीं सकते। इस प्रक्रिया को रियल एस्टेट जगत में ‘अंडरकोटिंग’ कहा जाता है— यानी किसी संपत्ति का अनुमानित मूल्य जानबूझकर कम बताना, ताकि अधिक से अधिक लोगों को नीलामी में खींचा जा सके।
एक विशेष डेटा माइनिंग जांच में बीते कुछ वर्षों के 36,000 से अधिक नीलामी परिणामों का विश्लेषण किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे—
कई घरों का असली बिक्री मूल्य, एजेंट द्वारा पहले बताए गए दाम से औसतन 15-20% अधिक निकला।
कुछ मामलों में अंतर कई लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक था।
अनुमान से कम कीमत सुनकर बोली लगाने पहुंचे खरीदार नीलामी के बीच में ही अपनी सीमा से बाहर हो जाते हैं।
जब संभावित खरीदारों को यह पता ही नहीं होता कि असल में घर की कितनी कीमत लगने वाली है, तो वे ‘बिडिंग ब्लाइंड’ यानी ‘अंधी बोली’ में भाग लेते हैं। इसका मतलब—
निरीक्षण के लिए कई बार आना-जाना।
वकीलों और बिल्डिंग इंस्पेक्शन पर हज़ारों डॉलर खर्च करना।
अंत में, घर हाथ से निकल जाना और समय व पैसे की बर्बादी होना।
NSW में ‘अंडरकोटिंग’ तकनीकी रूप से ग़ैरकानूनी है। लेकिन रियल एस्टेट एजेंटों के लिए सज़ा बेहद मामूली है और निगरानी तंत्र कमज़ोर।
अधिकतर मामलों में केवल जुर्माना लगाया जाता है, जो एजेंट के लिए सिर्फ़ ‘व्यवसाय की लागत’ बनकर रह जाता है।
पारदर्शिता के नाम पर जो गाइड प्राइस (मार्गदर्शक मूल्य) दिया जाता है, वह अक्सर ‘चालाकी से कम’ तय किया जाता है।
उपभोक्ता अधिकार विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति सिर्फ़ बाज़ार में कृत्रिम प्रतिस्पर्धा पैदा करने और कीमतें ऊपर खींचने का हथकंडा है।
“जब तक सरकार भारी दंड और स्पष्ट मूल्य निर्धारण नियम लागू नहीं करेगी, खरीदारों का शोषण जारी रहेगा,”— रियल एस्टेट उपभोक्ता मंच के प्रवक्ता ने कहा।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि—
गाइड प्राइस पर आंख बंद करके भरोसा न करें।
स्वतंत्र बाज़ार मूल्यांकन करवाएं।
नीलामी से पहले अपनी सीमा तय कर लें और उसी पर अडिग रहें।