ऑस्ट्रेलिया की नेशनल्स पार्टी के नेता डेविड लिटलप्राउड ने सरकार से मांग की है कि अनुचित मूल्य निर्धारण कानूनों का बार-बार उल्लंघन करने वाले सुपरमार्केट्स के खिलाफ़ कड़े कदम उठाए जाएं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ता निगरानी संस्था ऑस्ट्रेलियन कॉम्पिटिशन एंड कंज़्यूमर कमीशन (ACCC) को इतना अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह गंभीर मामलों में सुपरमार्केट्स को अस्थायी रूप से बंद भी कर सके।
स्काई न्यूज़ से बातचीत में लिटलप्राउड ने कहा कि मौजूदा जुर्माने बड़े रिटेलर्स के लिए “व्यवसाय की लागत” से ज़्यादा कुछ नहीं हैं।
“अगर संस्कृति बदलनी है, तो ऐसे दंड चाहिए जिनमें सचमुच डर हो। $1.98 लाख का जुर्माना सिडनी या मेलबर्न की किसी दुकान के लिए मामूली है,” उन्होंने कहा।
उनके अनुसार, शुरुआती जुर्माना कम से कम $20 लाख होना चाहिए और बार-बार उल्लंघन पर डाइवेस्टमेंट (व्यवसाय के हिस्से बेचने) जैसे कड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
दिसंबर में कोषाध्यक्ष जिम चाल्मर्स ने घोषणा की थी कि नए कानूनों के तहत अनुचित किराना मूल्य निर्धारण को अवैध बनाया जाएगा। इन नियमों के उल्लंघन पर बड़े सुपरमार्केट्स पर $1 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
ये बदलाव फूड एंड ग्रोसरी कोड में किए जा रहे हैं और 1 जुलाई 2026 से लागू होंगे।
नए नियमों के तहत कोल्स, वूलवर्थ्स और एल्डी जैसे बड़े रिटेलर्स को आपूर्ति लागत और “उचित मुनाफ़े” से कहीं अधिक कीमत वसूलने की अनुमति नहीं होगी। गंभीर मामलों में दंड कंपनी के सालाना टर्नओवर के 10% तक पहुंच सकता है, जबकि कम गंभीर उल्लंघनों पर लगभग $2 लाख के नोटिस दिए जाएंगे।
लिटलप्राउड ने सत्तारूढ़ लेबर पार्टी पर आरोप लगाया कि उसने सुपरमार्केट सुधारों को लागू करने में देरी की है। उन्होंने ACCC की मार्च 2025 की रिपोर्ट की दो अहम सिफारिशों का हवाला दिया—
डायनेमिक प्राइसिंग जानकारी (ऑनलाइन मूल्य तुलना टूल) अनिवार्य करना
‘श्रिंकफ्लेशन’ रजिस्टर बनाना, जिससे उपभोक्ताओं को यह पता चल सके कि पैकेट छोटा कर कीमत बढ़ाई जा रही है या नहीं
उनका कहना था कि ऐसी पारदर्शिता से उपभोक्ताओं को सशक्त बनाया जा सकता है और ACCC को निगरानी में मदद मिलेगी।
सरकार ने पहले अपने कदमों का बचाव करते हुए कहा है कि ये बदलाव महंगाई और जीवन-यापन की लागत से जूझ रहे परिवारों के लिए ज़रूरी हैं।
जिम चाल्मर्स ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि परिवारों और पेंशनर्स को चेकआउट पर न्याय मिले और सुपरमार्केट्स ग्राहकों से अनुचित मुनाफ़ा न कमाएं।”
निष्कर्ष:
देश में बढ़ती महंगाई के बीच सुपरमार्केट्स की कीमतों पर सख़्ती एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। अब निगाहें इस पर हैं कि सरकार ACCC को और कितनी ताक़त देती है—और क्या प्रस्तावित कानून सचमुच उपभोक्ताओं और किसानों को राहत दिला पाएंगे।