"ऑस्ट्रेलिया पर संकट आया तो कौन लड़ेगा? हैनसन का विवादित बयान

"ऑस्ट्रेलिया पर संकट आया तो कौन लड़ेगा? हैनसन का विवादित बयान

केनबरा, 5 अगस्त 2025 — ऑस्ट्रेलिया की वन नेशन पार्टी की नेता और विवादित सांसद पॉलिन हैनसन ने एक बार फिर अपने बयान से सियासी हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा है कि अगर स्कूलों में बच्चों को ‘Acknowledgement to Country’ सिखाया जाता रहा, तो देश संकट के समय "रक्षा के बिना" रह जाएगा।

एक टेलीविज़न इंटरव्यू में हैनसन ने कहा कि यदि लोगों को यह महसूस कराया जाता है कि यह ज़मीन सिर्फ एक विशेष समुदाय की है, तो वे देश की रक्षा के लिए आगे नहीं आएंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "अगर मुझे लगता है कि यह ज़मीन किसी और जाति की है, तो मैं इसे बचाने के लिए नहीं खड़ी होऊंगी।"

'Welcome to Country' का विरोध

हैनसन ने संसद में ‘Welcome to Country’ समारोहों का विरोध करते हुए कहा कि यह केवल एक पक्षीय संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के सांसदों द्वारा संसद में इस दौरान पीछे मुड़ना एक ‘नेतृत्व का प्रतीक’ है और वे उन ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की आवाज़ बनना चाहती हैं जो अब यह सब नहीं देखना चाहते।

"हमारे बच्चों को स्कूलों में ज़मीन पर हाथ रखकर यह बोलना सिखाया जा रहा है कि यह ज़मीन आदिवासियों की है। इससे हम बच्चों को यह महसूस नहीं करा पा रहे हैं कि वे इस देश का हिस्सा हैं," हैनसन ने कहा।

'यह मेरा देश है, सबका है'

हैनसन ने यह भी कहा कि वह चाहती हैं कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अपने देश को अपना महसूस करें — न कि केवल एक समुदाय से जुड़ा हुआ मानें। "अगर कभी युद्ध हुआ और लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया गया कि यह देश उनका नहीं है, तो कितने लोग इसकी रक्षा के लिए खड़े होंगे?"

भविष्य की योजना और व्यक्तिगत संघर्ष

हैनसन ने यह भी ऐलान किया कि वह तीन साल बाद फिर से चुनाव लड़ेंगी। उन्होंने अपने राजनीतिक संघर्षों की बात करते हुए कहा, "मुझे जेल भेजा गया, मेरे ऊपर हर तरह के आरोप लगे, लेकिन मैं आज भी खड़ी हूं।"

उनका कहना है कि वह 'Conviction politician' हैं जो बिना डर के अपनी बात कहती हैं और ऑस्ट्रेलिया में हर नागरिक के लिए समान अवसर की पक्षधर हैं।


नोट: 'Acknowledgement to Country' और 'Welcome to Country' ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी समुदायों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की पारंपरिक विधियां हैं। इनका उद्देश्य है कि देश की मूल निवासी आबादी के योगदान और उपस्थिति को स्वीकारा जाए। लेकिन, कुछ राजनेता इसे विभाजनकारी मानते हैं।