राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि आज दुनिया के अधिकांश देश अपने-अपने स्वार्थों के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं, जबकि भारत की सोच हमेशा से सर्वकल्याण की रही है। भारत केवल अपने हित तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संकट के समय कई देशों की निस्वार्थ भाव से सहायता की है।
भागवत गुरुवार को राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के छोटी खाटू कस्बे में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज का मूल आधार धर्म है, और धर्म का वास्तविक अर्थ सत्य को जानना व उस पर चलना है। हमारे पूर्वजों ने सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह जैसे मूल्यों को जीवन में उतारा, जो आज भी भारत की पहचान बने हुए हैं।
सर संघचालक ने कहा कि भारत ने बिना किसी स्वार्थ के पाकिस्तान और श्रीलंका सहित अनेक देशों की कठिन समय में सहायता की है। यही भारतीय दृष्टि और संस्कृति का मूल स्वभाव है।
उन्होंने मर्यादा, अनुशासन और संतुलन को राष्ट्र की प्रगति की आधारशिला बताते हुए कहा कि धर्मग्रंथ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जीवन की दिशा तय करने की क्षमता रखते हैं। यदि समाज इन मूल्यों को अपनाए, तो व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
कार्यक्रम के बाद मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारकों के साथ अलग से संवाद भी किया।
इस अवसर पर जैन श्वेतांबर तेरापंथ संप्रदाय के सर्वोच्च आचार्य महाश्रमण ने भी संबोधन दिया। उन्होंने खोज, अहिंसा और करुणा को मानव जीवन के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि संतों की वाणी और धर्मग्रंथों के संदेश व्यक्ति के जीवन को सही दिशा दे सकते हैं।