ऑस्ट्रेलिया में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और आक्रामक वसूली नीतियों को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। एक हालिया जांच में खुलासा हुआ है कि कई निजी स्कूल बकाया फीस वसूलने के लिए अभिभावकों के खिलाफ बैंकों से भी अधिक संख्या में अदालतों का सहारा ले रहे हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि सैकड़ों परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं और कई मामलों में उन्हें दिवालिया तक घोषित होना पड़ा है।
अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की उम्मीद में उन्होंने दाखिला तो लिया, लेकिन हर साल बढ़ती फीस, अतिरिक्त चार्ज, जुर्माने और ब्याज ने उनकी आय से कहीं अधिक बोझ डाल दिया। जब परिवार समय पर भुगतान नहीं कर पाते, तो कई स्कूल सीधे कानूनी कार्रवाई शुरू कर देते हैं—जिसमें कोर्ट नोटिस, वकीलों की फीस और रिकवरी एजेंसियों की लागत भी जोड़ दी जाती है।
एक अभिभावक ने कहा,
“हमने बच्चों के भविष्य के लिए कर्ज़ लिया था, लेकिन स्कूल की कार्रवाई ने हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों छीन लिया।”
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ नामी और प्रतिष्ठित निजी स्कूलों ने फीस वसूली के लिए सबसे अधिक कोर्ट केस दर्ज किए हैं। आलोचकों का कहना है कि ये स्कूल आर्थिक रूप से मजबूत हैं, इसके बावजूद वे भुगतान में थोड़ी देरी होने पर भी कोई मानवीय लचीलापन नहीं दिखाते।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की कानूनी कार्रवाइयों का सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ता है।
कई बच्चों को बीच सत्र में स्कूल छोड़ना पड़ता है
मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव बढ़ता है
परिवारों के रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिक्षा को व्यापार की तरह चलाने की यह प्रवृत्ति मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है।
शिक्षा विशेषज्ञ और उपभोक्ता अधिकार संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि:
निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर सीमा तय की जाए
कोर्ट कार्रवाई से पहले मध्यस्थता (mediation) को अनिवार्य किया जाए
आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों के लिए विशेष सुरक्षा नियम बनाए जाएं
उनका कहना है कि शिक्षा का मकसद समाज को सशक्त बनाना है, न कि परिवारों को कर्ज़ और दिवालियेपन में धकेलना।
यह पूरा मामला ऑस्ट्रेलिया की शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—
क्या शिक्षा एक मौलिक अधिकार है या सिर्फ एक महंगा व्यापार?
अब निगाहें सरकार और शिक्षा नियामकों पर टिकी हैं कि वे इस बढ़ते संकट को रोकने के लिए कब और क्या ठोस कदम उठाते हैं।