ऑस्ट्रेलिया की राजनीति एक अहम मोड़ पर खड़ी नज़र आ रही है। दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी पार्टी One Nation और उसकी प्रमुख Pauline Hanson अब केवल हाशिये की ताकत नहीं रह गई हैं। पॉलिन हैनसन ने हालिया बयानों में स्पष्ट संकेत दिया है कि उनकी पार्टी का लक्ष्य अगला चुनाव जीतकर सरकार बनाना है।
इस राजनीतिक हलचल को और तेज़ कर दिया है पूर्व उप-प्रधानमंत्री Barnaby Joyce के वन नेशन से जुड़ने की चर्चा ने। इससे यह साफ होता है कि पारंपरिक रूढ़िवादी गठबंधन Coalition के भीतर बढ़ती टूट-फूट का लाभ उठाकर वन नेशन खुद को देश की प्रमुख दक्षिणपंथी शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पॉलिन हैनसन की राजनीति काफी हद तक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विचारधारा से मेल खाती है। इसमें राष्ट्रवाद, सख्त सीमा नियंत्रण, वैश्वीकरण का विरोध और ‘ऑस्ट्रेलिया फर्स्ट’ जैसे नारे प्रमुख हैं।
यदि वन नेशन सत्ता में आती है, तो उसकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर आव्रजन नीति में कठोर बदलाव हो सकते हैं। पार्टी लंबे समय से शरणार्थियों और प्रवासियों की संख्या घटाने, मुस्लिम आव्रजन पर रोक और अस्थायी वीज़ा कार्यक्रमों को सीमित करने की वकालत करती रही है।
वन नेशन की नीतियाँ ऑस्ट्रेलिया की बहुसंस्कृतिवादी पहचान को भी चुनौती देती हैं। पॉलिन हैनसन कई बार यह कह चुकी हैं कि बहुसंस्कृतिवाद ने देश की सामाजिक एकता को कमजोर किया है। उनकी सरकार बनने की स्थिति में स्कूलों, सार्वजनिक संस्थानों और मीडिया में ‘पारंपरिक ऑस्ट्रेलियाई मूल्यों’ को बढ़ावा देने की कोशिश की जा सकती है।
आर्थिक मोर्चे पर वन नेशन का रुख संरक्षणवादी है। पार्टी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों, विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर संदेह जताती रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय समझौतों से पीछे हटता है, तो इसका सीधा असर निर्यात, रोजगार और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से कटाव का रास्ता अल्पकाल में लोकप्रिय लग सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है।
वन नेशन कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने की बात करती है। अपराधियों के लिए कठोर सज़ा, पुलिस शक्तियों में विस्तार और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं पर सीमाएं लगाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, वन नेशन का बढ़ता प्रभाव इस बात का संकेत है कि आम मतदाता मौजूदा राजनीतिक दलों से असंतुष्ट हैं। बढ़ती महंगाई, आवास संकट और रोज़गार की अनिश्चितता ने ऐसे दलों के लिए ज़मीन तैयार की है जो सरल लेकिन तीखे समाधान पेश करते हैं।
हालाँकि पॉलिन हैनसन और वन नेशन खुद को आम ऑस्ट्रेलियाइयों की आवाज़ बताती हैं, लेकिन उनकी नीतियों की व्यवहारिकता और आर्थिक समझ पर गंभीर सवाल उठते हैं। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि क्या ऑस्ट्रेलियाई मतदाता ट्रम्प-शैली की राष्ट्रवादी राजनीति को अपनाने के लिए तैयार हैं, या फिर देश अपनी पारंपरिक उदार लोकतांत्रिक राह पर ही आगे बढ़ेगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वन नेशन अब ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में एक ऐसी ताकत बन चुकी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा।