नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों पर तनाव एक बार फिर सतह पर आ गया है। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने भारत को चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि "भारत को दो महीने के भीतर माफी मांगनी होगी और सौदा करना होगा।" यह बयान न केवल भारत-अमेरिका संबंधों में कड़वाहट का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन आर्थिक मोर्चे पर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है।
लुटनिक ने भारत के सामने कुछ शर्तें रखी हैं, जिन पर आगे की बातचीत और व्यापारिक समझौते का आधार तय होगा:
टैरिफ कम करने की मांग: अमेरिका का आरोप है कि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर अत्यधिक ऊंचे आयात शुल्क (टैरिफ) लगाता है। वाणिज्य सचिव ने साफ कहा कि भारत को इन ऊंची दरों को घटाना होगा, वरना व्यापारिक रिश्तों की पुनर्समीक्षा की जाएगी।
व्यापक व्यापार समझौता (Grand Trade Deal): अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ एक बड़े पैमाने का द्विपक्षीय समझौता करे, जिसमें कृषि, रक्षा सौदे, प्रौद्योगिकी, और निवेश जैसे क्षेत्र शामिल हों।
डॉलर और हथियार समझौते की शर्तें: अमेरिका चाहता है कि भारत डॉलर आधारित वित्तीय लेनदेन को और पारदर्शी बनाए तथा रक्षा सौदों में अमेरिकी शर्तों को मान्यता दे।
ब्लूमबर्ग पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान लुटनिक ने कहा कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं होगा, अंततः उसे अमेरिका से "माफी मांगनी और सौदा करना ही पड़ेगा।"
उन्होंने यह भी जोड़ा कि लगभग 7,000 टैरिफ लाइनों में बदलाव संभव है, लेकिन यह प्रक्रिया समय और धैर्य की मांग करती है। उनके अनुसार, "अगर भारत इस दिशा में कदम नहीं उठाता, तो आने वाले महीनों में रिश्तों पर गंभीर असर होगा।"
यह धमकी भारत के लिए दोहरी स्थिति लेकर आई है। एक ओर, भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और अमेरिका उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दूसरी ओर, भारत अपनी नीतियों में संप्रभुता और आत्मनिर्भरता बनाए रखना चाहता है।
चुनौती: अमेरिका के दबाव में आकर शुल्क कम करना भारत के किसानों और छोटे उद्योगों पर असर डाल सकता है।
अवसर: यदि भारत व्यापक समझौते की दिशा में बढ़ता है, तो उसे अमेरिकी बाज़ार तक अधिक पहुंच और निवेश का फायदा मिल सकता है।
राजनयिक संतुलन: विदेश मंत्रालय को अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखना होगा, ताकि धमकी को सीधे टकराव में बदले बिना रास्ता निकाला जा सके।
घरेलू उद्योग की सुरक्षा: सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि टैरिफ में बदलाव से घरेलू उद्योग प्रभावित न हों।
बहुपक्षीय मंचों का उपयोग: भारत WTO और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने पक्ष को मज़बूती से रख सकता है।