नई दिल्ली।
आर्कटिक क्षेत्र में स्थित बर्फीला द्वीप ग्रीनलैंड एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों के बाद यह सवाल तेज हो गया है कि क्या अमेरिका वाकई ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की दिशा में गंभीर कदम उठा सकता है और क्या इससे यूरोप के साथ टकराव की स्थिति बनेगी।
दरअसल, यह कोई नई कहानी नहीं है। अमेरिका करीब 200 वर्षों से ग्रीनलैंड में रणनीतिक दिलचस्पी रखता रहा है और अलग-अलग दौर में इसे हासिल करने के कम से कम पांच प्रयास कर चुका है।
1814 की कील संधि के बाद डेनमार्क-नार्वे का विभाजन हुआ। नार्वे अलग हो गया, लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क के पास ही रहा। तभी से अमेरिका की नजर इस क्षेत्र पर टिक गई।
1832 में अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन के दौर में पहली बार ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार सामने आया। उन्नीसवीं सदी में लुइसियाना परचेज और मुनरो डॉक्ट्रिन जैसी नीतियों के तहत अमेरिका तेजी से अपने भू-क्षेत्र का विस्तार कर रहा था।
1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीदा। उसी समय ग्रीनलैंड को भी खरीदने की चर्चा हुई। अमेरिका की रणनीति कनाडा पर दबाव बनाने और उत्तरी अटलांटिक में अपनी स्थिति मजबूत करने की थी, लेकिन ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय शक्तियों के विरोध के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड और डेनिश वेस्ट इंडीज को खरीदने की कोशिश की ताकि जर्मनी के खिलाफ सैन्य ठिकाने बनाए जा सकें। 1917 में डेनिश वेस्ट इंडीज अमेरिका को मिल गया, लेकिन ग्रीनलैंड नहीं।
द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी के डेनमार्क पर कब्जे के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड में कूटनीतिक और सैन्य मौजूदगी बढ़ाई। 1941 में डेनमार्क की सहमति से वहां अमेरिकी सैन्य अड्डे बने। युद्ध के बाद 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने ग्रीनलैंड खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव रखा, जिसे डेनमार्क ने ठुकरा दिया।
अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध के दौर में ग्रीनलैंड की अहमियत और बढ़ गई। 1951 की रक्षा संधि के तहत वहां अमेरिकी एयरबेस बनाया गया, जो आगे चलकर नाटो की उत्तरी सुरक्षा ढाल का अहम हिस्सा बना। इस दौरान ग्रीनलैंड की स्थानीय आबादी की राय को खास तवज्जो नहीं दी गई।
सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ समय तक अमेरिका का ध्यान ग्रीनलैंड से हटा रहा, लेकिन यूक्रेन युद्ध, रूस की आक्रामकता और चीन की आर्कटिक में बढ़ती दिलचस्पी ने वॉशिंगटन की चिंता फिर बढ़ा दी है।
2019 में ट्रंप प्रशासन ने खुलकर ग्रीनलैंड खरीदने का विचार रखा। हालिया बयानों में ट्रंप ने दावा किया है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
ग्रीनलैंड की आबादी करीब 50 हजार है। ऐसे में सवाल उठता है—
क्या ग्रीनलैंड और डेनमार्क अमेरिकी दबाव का सामना कर पाएंगे?
क्या यूरोपीय देश अमेरिका के खिलाफ सख्त रुख अपनाएंगे?
यूक्रेन युद्ध में उलझा यूरोप इस मुद्दे पर कितना आगे जाएगा?
रूस और चीन की चुप्पी के पीछे क्या कोई रणनीतिक समझ है?