सिडनी। न्यू साउथ वेल्स (NSW) में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। यहां 47 सेलेक्टिव हाई स्कूल चल रहे हैं, जिनमें प्रवेश केवल विशेष परीक्षा पास करने के बाद ही मिलता है। संख्या के लिहाज़ से यह किसी भी अन्य ऑस्ट्रेलियाई राज्य से कहीं अधिक है। लेकिन अब बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कोचिंग कल्चर ने कई अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
सेलेक्टिव स्कूलों में दाखिले के लिए बच्चों को बेहद कठिन एंट्रेंस टेस्ट से गुजरना पड़ता है। इस टेस्ट की तैयारी के लिए महंगी कोचिंग क्लासेस का सहारा लेना लगभग ज़रूरी हो गया है।
एक औसत कोचिंग पैकेज की लागत हज़ारों डॉलर तक पहुँचती है।
अभिभावक शिकायत करते हैं कि गरीब या सामान्य आय वाले परिवारों के लिए यह संभव नहीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह “कोचिंग कल्चर” शिक्षा में असमानता बढ़ा रहा है और बच्चों को कम उम्र में ही मानसिक तनाव की ओर धकेल रहा है।
कई अभिभावक और शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था का मकसद सभी बच्चों को बराबरी का अवसर देना है। लेकिन मौजूदा प्रणाली ने दो वर्ग खड़े कर दिए हैं—
वे बच्चे जो महंगी कोचिंग लेकर आगे निकल जाते हैं।
वे बच्चे जो कोचिंग न कर पाने की वजह से पीछे रह जाते हैं।
यही कारण है कि अब सेलेक्टिव स्कूलों की उपयोगिता और आवश्यकता पर सवाल उठ रहे हैं।
राज्य सरकार से मांग की जा रही है कि—
चयन प्रक्रिया की समीक्षा की जाए।
ग्रामीण और साधारण पब्लिक स्कूलों को भी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
बच्चों को रट्टा और प्रतिस्पर्धा से हटाकर रचनात्मक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाए।
कई शिक्षा विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि यदि सेलेक्टिव स्कूलों की व्यवस्था जारी भी रखी जाए, तो उसमें सामाजिक न्याय और पारदर्शिता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि कम उम्र में अत्यधिक परीक्षा-प्रतिस्पर्धा बच्चों के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
कई बच्चे परीक्षा में असफल होने पर हीनभावना का शिकार हो रहे हैं।
अभिभावक मानते हैं कि यह “दबाव आधारित शिक्षा” बच्चों के समग्र विकास को रोक रही है।