नई दिल्ली, 1 सितंबर 2025 — भारत में सड़क हादसों की भयावह तस्वीर सामने आई है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी “सड़क हादसे 2023” रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में प्रतिदिन औसतन 474 लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा बैठे। पूरे साल में यह आंकड़ा बढ़कर 1.72 लाख मौतों तक पहुंच गया। यह संख्या 2022 के मुकाबले 2.6% अधिक है।
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि तेज गति से गाड़ी चलाना यानी ओवरस्पीडिंग, सड़क हादसों का सबसे बड़ा कारण है।
2023 में कुल मौतों में से 68% मौतें ओवरस्पीडिंग के चलते हुईं।
कुल हादसों में से 68.4% और घायलों के मामलों में 69.2% इसी वजह से दर्ज हुए।
हालांकि यह आंकड़ा 2020 के बाद सबसे कम है, लेकिन फिर भी यह सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है।
सड़क सुरक्षा नियमों की अनदेखी से हजारों लोगों की जान चली गई।
हेलमेट न पहनने से 54,568 मौतें दर्ज हुईं (कुल मौतों का 31.6%)।
सीट बेल्ट का उपयोग न करने से 16,025 लोगों की जान गई (कुल मौतों का 9.3%)।
नशे में गाड़ी चलाने से 3,674 लोगों की मौत और 7,253 लोग घायल हुए।
राज्यों की स्थिति पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है।
उत्तर प्रदेश में 23,652 मौतें दर्ज हुईं, जो 2022 से भी अधिक है।
अंडमान-निकोबार में सबसे कम केवल 24 मौतें हुईं।
शहरों की बात करें तो —
दिल्ली में 1,457 मौतें हुईं, जो सबसे ज्यादा है।
इसके बाद बेंगलुरु (915) और जयपुर (849) का स्थान रहा।
वहीं अमृतसर, चंडीगढ़ और श्रीनगर सबसे सुरक्षित शहरों में रहे।
रिपोर्ट के अनुसार, सड़क हादसे युवाओं और बच्चों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
18 से 45 साल की उम्र में 1,14,861 लोगों की मौत हुई, जो कुल मौतों का 66% है।
9,489 बच्चों की जान गई — यानी औसतन हर दिन 26 बच्चे सड़क हादसों में मारे गए।
सड़क पर पैदल चलने वाले और दोपहिया वाहन चालक सबसे ज्यादा असुरक्षित साबित हो रहे हैं।
दो पहिया वाहनों से जुड़े हादसों में 44.8% मौतें हुईं।
पैदल यात्रियों की मौतें 20.4% तक पहुंच गईं (35,221 मौतें)।
दोनों को मिलाकर यह आंकड़ा कुल मौतों का 65.1% है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2016 से अब तक पैदल यात्रियों की मौतों में 124% और दोपहिया चालकों में 48% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सेवलाईफ फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ पीयूष तिवारी ने कहा,
“रिपोर्ट के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। सरकार ने सड़क सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर असर दिखाने के लिए और कड़े प्रयास करने होंगे।”
उन्होंने यह भी कहा कि हादसों की बड़ी वजहें हैं:
ट्रैफिक नियमों के पालन की कमी।
सड़क ढांचे में गंभीर खामियां — लेन मार्किंग का अभाव, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित जगह की कमी, हाईवे पर असुरक्षित गैप और शार्प टर्न पर चेतावनी बोर्ड का न होना।
सड़क किनारे मौजूद एक्सपोज़्ड ऑब्जेक्ट्स से टकराकर भी कई हादसे हो रहे हैं।
समाधान के तौर पर उन्होंने सुझाव दिया कि —
ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन करवाया जाए।
हेलमेट और सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
सड़क ढांचे में सुधार और उचित डिजाइन पर ध्यान दिया जाए।
जनजागरूकता अभियान चलाकर आम नागरिकों को सड़क सुरक्षा का महत्व समझाया जाए।
भारत में सड़क हादसे अब केवल ट्रैफिक की समस्या नहीं रहे, बल्कि यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य और सामाजिक संकट बन चुके हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर दिन सैकड़ों परिवार अपनों को खो रहे हैं। अगर सरकार और समाज मिलकर कठोर कदम नहीं उठाते, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।