कैनबरा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित विवादास्पद “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने का निमंत्रण ऑस्ट्रेलियाई सरकार के लिए परेशानी का कारण बन गया है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ की सरकार इस प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट निर्णय लेने में असमर्थ दिखाई दे रही है और अंदरूनी सूत्रों के अनुसार उसकी प्राथमिक रणनीति यही है कि यह मामला समय के साथ स्वतः ही शांत हो जाए।
सूत्रों ने बताया कि सरकार इस पहल से जुड़ना नहीं चाहती, लेकिन सीधे तौर पर इसे ठुकराने से भी बच रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे “गरम आलू” की संज्ञा देते हुए कहा कि कैनबरा इस मुद्दे को हाथ में लेने से कतरा रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस सप्ताह करीब 60 देशों को “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। प्रस्तावित बोर्ड का उद्देश्य वैश्विक संघर्षों को सुलझाना बताया गया है, जिसकी शुरुआत गाज़ा संकट से करने की बात कही गई है। ट्रंप के अनुसार, वह स्वयं इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे और सदस्यता को लेकर अंतिम निर्णय भी उन्हीं के हाथ में रहेगा। बताया गया है कि स्थायी सदस्यता के लिए देशों को एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देना होगा।
प्रधानमंत्री अल्बानीज़ और सरकार के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस निमंत्रण पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता फिलहाल घरेलू सुरक्षा से जुड़े कानूनों पर है और अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों पर अभी विस्तार से ध्यान नहीं दिया गया है।
विशेषज्ञों और सरकारी हलकों में चिंता जताई जा रही है कि यह नया बोर्ड संयुक्त राष्ट्र जैसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मंचों की भूमिका को कमजोर कर सकता है। इसी आशंका के चलते सरकार इस पहल से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया फिलहाल न तो अमेरिका को नाराज़ करना चाहता है और न ही ऐसी किसी पहल का हिस्सा बनना चाहता है, जो वैश्विक कूटनीति में विवाद का कारण बने। ऐसे में “बोर्ड ऑफ पीस” पर चुप्पी और टालमटोल ही सरकार की पसंदीदा नीति बनती दिख रही है।