हाल के दिनों में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला और ग्रीनलैंड को लेकर अपनाई गई आक्रामक नीति ने वैश्विक शक्ति संतुलन को एक बार फिर अस्थिर कर दिया है। यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए चेतावनी है जिस पर पिछले कई दशकों से अपेक्षाकृत स्थिरता बनी हुई थी।
अमेरिका का वेनेज़ुएला में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और ग्रीनलैंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र पर नियंत्रण की खुली मंशा यह दर्शाती है कि वाशिंगटन अब नियम-आधारित विश्व व्यवस्था से अधिक, शक्ति-आधारित राजनीति को प्राथमिकता दे रहा है। यह बदलाव केवल छोटे या कमजोर देशों के लिए ही नहीं, बल्कि उसके सहयोगी राष्ट्रों के लिए भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में ऑस्ट्रेलिया की स्थिति विशेष रूप से जटिल है। ऐतिहासिक रूप से ऑस्ट्रेलिया ने स्वयं को अमेरिका का विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार माना है। किंतु एक ‘उप-साम्राज्यवादी शक्ति’ (sub-imperial power) के रूप में कार्य करना, ऐसे समय में जोखिम भरा हो सकता है जब अंतरराष्ट्रीय नियम स्वयं कमजोर पड़ते जा रहे हों।
यदि वैश्विक व्यवस्था अस्थिर होती है, तो केवल छोटे देश ही नहीं, बल्कि मध्यम शक्तियाँ भी असुरक्षित हो जाती हैं। ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा, व्यापार और कूटनीति — तीनों ही एक स्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर निर्भर हैं। ऐसे में केवल किसी एक महाशक्ति के निर्णयों पर निर्भर रहना अब व्यावहारिक नहीं रह गया है।
यह संयोग नहीं है कि ये घटनाएँ ऑस्ट्रेलियाई संघ (Federation) के लगभग 120 वर्ष पूरे होने के समय सामने आई हैं। यह क्षण प्रतीकात्मक भी है और व्यावहारिक भी। यह ऑस्ट्रेलिया के लिए एक राष्ट्रीय परिपक्वता की परीक्षा है।
परिपक्व राष्ट्र वही होता है जो—
अपने सहयोगियों का सम्मान करता है, पर आँख मूँदकर अनुसरण नहीं करता
अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता है, चाहे वह शक्तिशाली देशों के विरुद्ध ही क्यों न हो
अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र सोच और दीर्घकालिक हितों के आधार पर गढ़ता है
ऑस्ट्रेलिया को अब यह तय करना होगा कि वह केवल एक रणनीतिक अनुयायी बना रहेगा या फिर एक स्वतंत्र और जिम्मेदार वैश्विक भूमिका निभाएगा।