सिडनी, 6 सितम्बर 2025
ऑस्ट्रेलिया इन दिनों जिस संकट से गुजर रहा है, उसने पूरे देश का चेहरा बदल दिया है। सड़कों पर बढ़ते विरोध, नस्लवाद की घटनाएँ और राजनीतिक ध्रुवीकरण यह दिखा रहे हैं कि असली समस्या अर्थव्यवस्था की है—लेकिन गुस्सा गलत दिशा में फूट रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में महंगाई ने रफ्तार पकड़ ली है। कोविड के बाद जब अंतरराष्ट्रीय छात्र और बैकपैकर्स वापस आए तो अचानक हुई आवक ने किराये के मकानों की भारी कमी पैदा कर दी। इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ा और आम लोगों की जेब ढीली हो गई।
विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या प्रवासन से नहीं, बल्कि आपूर्ति और मांग के असंतुलन से जुड़ी है। मकानों की कमी और किराये में आग ने लोगों को नाराज किया है। और इसी गुस्से का नतीजा है कि कुछ लोग प्रवासियों को दोषी ठहराने लगे हैं।
इतिहास गवाह है कि आर्थिक तंगी के समय नस्लीय तनाव बढ़ते हैं। 1990 के दशक में बेरोजगारी के चरम पर पॉलिन हैनसन की राजनीति उभरी थी। जर्मनी के 1920 के दशक की तबाही से नाजीवाद मजबूत हुआ। और आज ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर फिर से नाजी झंडे लहराते देखना इसी खतरनाक पैटर्न की याद दिलाता है।
हाल ही में मेलबर्न में "मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया" नाम से निकले रैलियों में नेशनल सोशलिस्ट नेटवर्क के सदस्य खुलेआम प्रवासियों के खिलाफ नारेबाजी करते दिखे।
ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से प्रवासियों की वजह से आर्थिक शक्ति बना है। लेकिन कोविड के बाद हुई तेज़ भरपाई (refill) ने किराया संकट जरूर पैदा किया। यह स्थिति अस्थायी थी, लेकिन असर गहरा हुआ।
विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रवासन दर को लेकर सोच-समझकर संतुलन ज़रूरी है। पर प्रवासियों से नफरत करना या नस्लवादी राजनीति करना किसी भी तरह से समाधान नहीं है।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, जिन लोगों की जवानी आर्थिक संकट में बीती होती है, वे जीवनभर प्रवासियों के प्रति नकारात्मक नजरिया रखते हैं। यही वजह है कि आर्थिक दबाव नस्लवाद को हवा देता है।
लेकिन साफ है: समस्या किराये और महंगाई की है, नस्ल या प्रवासियों की नहीं। गुस्सा सही जगह होना चाहिए—सरकार की नीतियों पर, न कि इंसान की जाति या रंग पर।