बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण के महज 30 घंटे बाद ही नए मंत्रिमंडल का शक्ति-वितरण पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। संख्या के साथ-साथ मंत्रालयों के स्तर पर भी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने जदयू पर भारी बढ़त बना ली है। इस बार के कैबिनेट गठन से यह साफ संकेत मिलता है कि राज्य के प्रशासनिक ढांचे का वास्तविक नियंत्रण बीजेपी के हाथों में आ गया है।
बिहार के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय बाद ऐसा हुआ है कि मुख्यमंत्री ने गृह विभाग अपनी जिम्मेदारी से हटाकर किसी अन्य मंत्री को सौंपा है। उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय की कमान देकर पार्टी ने न केवल अपनी पकड़ मजबूत की है, बल्कि सरकार की रोज़मर्रा की कानून-व्यवस्था वाली मशीनरी पर सीधी पकड़ हासिल की है।
नए कैबिनेट में बीजेपी ने कृषि, सहकारिता, वन-पर्यावरण, पर्यटन, नगर विकास, श्रम संसाधन, पशु एवं मत्स्य, पथ निर्माण जैसे कई अहम मंत्रालय अपने खाते में रखे हैं। ये विभाग न सिर्फ प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि राजनीतिक और जनसंपर्क स्तर पर भी सीधे प्रभाव डालते हैं।
दूसरी ओर, जदयू को वित्त, ऊर्जा, वाणिज्य एवं उद्योग जैसे विभाग मिले हैं, जो महत्व के बावजूद ‘सीधे जनसंपर्क वाले’ मंत्रालयों की तुलना में कुछ हद तक कम चमकदार माने जाते हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सामान्य प्रशासन, मंत्रिमंडल सचिवालय, निगरानी, निर्वाचन सहित कुछ पारंपरिक विभाग अपने पास रखे हैं। इससे संकेत मिलता है कि वे अब प्रशासनिक संचालन के बजाय समन्वय और नीति-निर्देशन की भूमिका पर अधिक फोकस करेंगे।
बीजेपी के दूसरे उपमुख्यमंत्री, विजय कुमार सिन्हा, को राजस्व एवं भूमि सुधार तथा खान-भूतत्व जैसे संवेदनशील और निवेश से जुड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बीजेपी ने ग्रामीण-शहरी विकास, निवेश और सुरक्षा—तीनों मोर्चों पर अपनी पकड़ मजबूत रखने का लक्ष्य तय किया है।
26 सदस्यीय कैबिनेट में बीजेपी के 14 मंत्री, जदयू के 8, जबकि सहयोगी दलों के 4 मंत्री शामिल किए गए हैं। यह संयोजन भी संकेत देता है कि गठबंधन सरकार का संचालन अब बीजेपी अधिक मजबूती से कर रही है।
मंत्रालयों के इस बंटवारे से यह साफ झलक रहा है कि भले ही मुख्यमंत्री जदयू के नीतीश कुमार हों, लेकिन सत्ता का वास्तविक संचालन और नीतियों पर प्रभाव अब बीजेपी के पास है।
गृह विभाग और विकास संबंधित बड़े मंत्रालय मिलने से बीजेपी की राज्य राजनीति में पकड़ आने वाले महीनों में और मजबूत होती दिख रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मॉडल आने वाले निकाय और विधानसभा चुनावों की तैयारी का भी संकेत है—जहाँ बीजेपी फ्रंट-फुट पर रहकर चुनावी रणनीति तय करेगी, और जदयू समन्वयकारी भूमिका में दिखाई पड़ सकती है।