ग्रीनलैंड में तनाव: यूरोपीय सैनिकों की तैनाती, ट्रंप के टैरिफ से हालात और बिगड़े

ग्रीनलैंड में तनाव: यूरोपीय सैनिकों की तैनाती, ट्रंप के टैरिफ से हालात और बिगड़े

ग्रीनलैंड में उस समय राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया जब कई यूरोपीय देशों के सैनिक एक सैन्य अभ्यास के तहत द्वीप पर पहुँचे और इसके विरोध में हजारों स्थानीय नागरिक सड़कों पर उतर आए। इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने ग्रीनलैंड को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए यूरोप के कई देशों पर नए व्यापारिक शुल्क (टैरिफ) लगाने की घोषणा कर दी।

डेनमार्क के नेतृत्व में चल रहे इस सैन्य अभ्यास को ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में नाटो देशों की सामूहिक सुरक्षा प्रतिबद्धता को दर्शाना बताया गया है। इस अभ्यास के तहत फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, फिनलैंड, ब्रिटेन, नीदरलैंड और बेल्जियम के सीमित संख्या में सैनिक ग्रीनलैंड पहुँचे हैं।

डेनिश अधिकारियों के अनुसार, यह अभ्यास मुख्य रूप से रूस की संभावित गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आयोजित किया गया है और इसमें अमेरिका को भी आमंत्रित किया गया था।

हालाँकि, इस सैन्य मौजूदगी के विरोध में ग्रीनलैंड की राजधानी Nuuk में शनिवार को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों के हाथों में “ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है” और “हम अपना भविष्य खुद तय करेंगे” जैसे नारे लिखे बैनर थे। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री Jens-Frederik Nielsen भी इस मार्च में शामिल हुए, जो अमेरिकी वाणिज्य दूतावास तक पहुँचा।

स्थानीय जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग 85 प्रतिशत ग्रीनलैंडवासी अमेरिका द्वारा किसी भी प्रकार के अधिग्रहण के खिलाफ हैं।

इसी दिन डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की, जिसे जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि ये शुल्क तब तक लागू रहेंगे जब तक ग्रीनलैंड को लेकर “समझौता” नहीं हो जाता।

अपने सोशल मीडिया मंच पर दिए गए बयान में ट्रंप ने दावा किया कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण “वैश्विक शांति” के लिए आवश्यक है और चीन तथा रूस इस क्षेत्र में रुचि रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को अपने प्रस्तावित मिसाइल रक्षा तंत्र के लिए ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति की आवश्यकता है।

डेनमार्क और NATO से जुड़े देशों ने ट्रंप के बयानों को खारिज करते हुए ग्रीनलैंड की स्वायत्तता और वहां के लोगों के अधिकारों का समर्थन दोहराया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को और जटिल बना सकती है।