ईरान जंग में पिटा, फिर भी पाकिस्तान की तरह मना रहा जश्न

ईरान जंग में पिटा, फिर भी पाकिस्तान की तरह मना रहा जश्न

नई दिल्ली।
ईरान और इज़रायल के बीच हालिया युद्ध में भारी सैन्य नुकसान झेलने के बावजूद ईरान की सड़कों पर जश्न जैसा माहौल देखा गया, जो पाकिस्तान की पुराने रवैये की याद दिलाता है — जब हार के बावजूद प्रचार में ‘विजय’ का दावा किया जाता है। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ पश्चिमी दुनिया बल्कि खुद इज़रायल और अमेरिका में भी बहस छेड़ दी है, जहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।

ईरान ने बताया 'रणनीतिक जीत', हकीकत कुछ और

तेहरान के सरकारी मीडिया चैनलों ने दावा किया है कि देश ने "शत्रु के मंसूबों को नाकाम कर दिया", जबकि सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध में ईरान को काफी नुकसान हुआ है – हथियारों के भंडार, रडार बेस और मिसाइल लॉन्च साइटों को भारी क्षति पहुँची है। इसके बावजूद, तेहरान में सड़कों पर लोग मिठाइयाँ बाँटते और झंडे लहराते नजर आए।

पाकिस्तान जैसी रणनीति?

ईरान की यह रणनीति पाकिस्तान के 1965 और 1971 की जंग के बाद के रुख से मेल खाती है, जब भले ही जमीनी हकीकत अलग रही हो, लेकिन सरकारी दावों और मीडिया प्रोपेगेंडा में 'विजय उत्सव' दिखाया गया। इस बार भी ईरान की सरकारी प्रचार प्रणाली ने ऐसा ही माहौल बनाया।

नेतन्याहू पर इज़रायली जनता का दबाव

दूसरी ओर, इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू घरेलू मोर्चे पर आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं। युद्ध में इज़रायली जवानों की मौत, हमलों की निरंतरता और रणनीतिक असफलताओं को लेकर जनता में असंतोष बढ़ रहा है। सोशल मीडिया और विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री से जवाबदेही की मांग की है।

अमेरिका में ट्रंप की आलोचना

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने इज़रायल को खुला समर्थन दिया था, अब विपक्षी दलों के निशाने पर हैं। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और बिना सोच-समझ के समर्थन ने इस युद्ध को और भड़काया। कई विश्लेषकों का मानना है कि इससे अमेरिका की वैश्विक छवि को भी नुकसान पहुंचा है।

निष्कर्ष: जश्न के पीछे की कड़वी सच्चाई

ईरान का जश्न जितना सतही रूप से भावनात्मक और प्रतीकात्मक है, उतना ही कड़वा सच इसके पीछे छिपा है — रणनीतिक असफलता, सैन्य नुकसान और अंतरराष्ट्रीय छवि को झटका। साथ ही, इस युद्ध ने नेतन्याहू और ट्रंप जैसे नेताओं की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।