सिडनी/कैनबरा:
उत्तर कोरिया से जुड़ा एक बड़ा साइबर और पहचान धोखाधड़ी नेटवर्क सामने आया है, जो ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों की कंपनियों को निशाना बनाकर करोड़ों डॉलर जुटा रहा है। यह पैसा कथित तौर पर उत्तर कोरिया के हथियार और मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत करने में इस्तेमाल किया जा रहा है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नेटवर्क के तहत संदिग्ध लोग फर्जी पहचान (Fake IDs) का इस्तेमाल कर विदेशी कंपनियों में नौकरी हासिल करते हैं। ये लोग खुद को स्थानीय नागरिक या वैध कामगार बताकर रिमोट (दूरस्थ) तरीके से काम करते हैं, जबकि असल में उनका संचालन उत्तर कोरिया से जुड़ा होता है।
इस पूरे नेटवर्क का खुलासा तब हुआ जब एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने एक संदिग्ध आवेदक की जांच की। “एरन पियरसन” नाम से नौकरी के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति की पहचान संदिग्ध लगी, जिसके बाद गहराई से जांच की गई और एक बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश हुआ।
जांच में यह भी सामने आया कि “लैपटॉप फार्म” नामक सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इसमें अलग-अलग देशों में रखे गए लैपटॉप्स के जरिए ऐसा दिखाया जाता है कि कर्मचारी उसी देश में मौजूद हैं। वास्तव में, इन सिस्टम्स को दूर से कंट्रोल किया जाता है ताकि कंपनियों को शक न हो।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नेटवर्क बेहद संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत है। इससे कंपनियों की गोपनीय जानकारी और साइबर सुरक्षा को भी गंभीर खतरा हो सकता है।
Kim Jong-un के नेतृत्व वाले उत्तर कोरिया पर पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए हैं। ऐसे में इस तरह के गैरकानूनी तरीकों से विदेशी मुद्रा जुटाने की कोशिशें चिंता का विषय बन गई हैं।
ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा एजेंसियों ने कंपनियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। खासकर रिमोट हायरिंग के दौरान पहचान सत्यापन (verification) को और मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक समस्या है, जिसमें कई विकसित देश प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार और साइबर सुरक्षा एजेंसियां अब इस नेटवर्क को तोड़ने और इससे जुड़े लोगों की पहचान करने में जुटी हुई हैं।