सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)। न्यू साउथ वेल्स स्थित कैम्पियन कॉलेज (Campion College) इन दिनों सुर्खियों में है। कॉलेज के डीन ऑफ स्टडीज़ स्टीफन मैकइनर्नी (Stephen McInerney) और वरिष्ठ व्याख्याता स्टीफन चावुरा (Stephen Chavura) पर आरोप है कि वे छात्रों के बीच अतिदक्षिणपंथी (फार-राइट) विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं। दोनों के हालिया बयानों ने न केवल अकादमिक जगत को झकझोर दिया है, बल्कि सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के बीच भी गहरी चिंता पैदा कर दी है।
डीन ऑफ स्टडीज़ स्टीफन मैकइनर्नी का एक बयान सबसे अधिक विवादित माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया को विशेष रूप से श्वेत ऑस्ट्रेलियाईयों (White Australians) के हितों की रक्षा के लिए अलग राजनीतिक दल की ज़रूरत होगी। विशेषज्ञों और आलोचकों ने इस टिप्पणी को स्पष्ट रूप से नस्लवादी और विभाजनकारी करार दिया है। उनका कहना है कि ऐसे विचार बहुसांस्कृतिक समाज की आत्मा पर प्रहार करते हैं।
सीनियर लेक्चरर स्टीफन चावुरा का बयान भी उतना ही विवादित है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि एंग्लो-सेल्टिक क्लब बनाया जाना चाहिए, ताकि यह “वामपंथी गुंडों” के मन में भय पैदा करे। शिक्षाविदों का मानना है कि यह सोच न केवल शैक्षणिक माहौल को दूषित करेगी, बल्कि छात्रों को हिंसा और वैचारिक टकराव की ओर धकेल सकती है।
इन बयानों के सामने आने के बाद कॉलेज प्रशासन दबाव में है। अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि कॉलेज प्रबंधन को तुरंत इस मामले पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिक्षा संस्थानों को किसी भी रूप में कट्टरपंथी राजनीति का मंच न बनने दिया जाए। कई शिक्षण संगठनों ने इसे लेकर बयान जारी किया है कि अगर ऐसे विचारों को अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर पनपने दिया गया तो इसका खामियाज़ा पूरी युवा पीढ़ी को भुगतना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया पहले से ही श्वेत राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथी उग्रवाद की बढ़ती सक्रियता से जूझ रहा है। ऐसे में यदि विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर ही शिक्षकों द्वारा इस तरह के विचार प्रचारित किए जाने लगे तो यह देश की सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक परंपराओं और बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।