लखनऊ, 18 जुलाई 2025:
उत्तर प्रदेश में पहली बार 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) के मामले में कोर्ट ने कड़ी सजा सुनाई है। लखनऊ की एक विशेष अदालत ने आरोपी देबाशीष राय को महिला डॉक्टर से 85 लाख रुपये की ठगी करने और खुद को फर्जी CBI अधिकारी बताकर उन्हें डिजिटल तरीके से 'गिरफ्तार' करने के मामले में 7 साल की सजा और ₹68,000 जुर्माना सुनाया है।
यह सनसनीखेज मामला मई 2024 का है, जब लखनऊ की एक महिला डॉक्टर डॉ. सौम्या गुप्ता को एक अज्ञात नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को कस्टम और बाद में CBI अधिकारी बताया और डॉक्टर पर यह आरोप लगाया कि उनके नाम से ड्रग्स और फर्जी पासपोर्ट विदेश भेजे जा रहे हैं।
इसके बाद वीडियो कॉल पर कथित अधिकारी ने डॉक्टर को कहा कि उन्हें "डिजिटल अरेस्ट" कर लिया गया है और अब वे घर पर रहते हुए CBI की निगरानी में हैं। डॉक्टर को धमकी दी गई कि अगर उन्होंने सहयोग नहीं किया, तो उनकी मेडिकल डिग्री रद्द कर दी जाएगी और उन्हें जेल जाना पड़ेगा।
आरोपी ने डॉ. गुप्ता को दस दिन तक वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा और मानसिक दबाव डालकर उनसे कुल 85 लाख रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवा लिए। पीड़िता ने जब बाद में ठगी का अहसास हुआ, तब उन्होंने साइबर सेल में शिकायत दर्ज करवाई।
लखनऊ साइबर क्राइम सेल ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाई। मोबाइल ट्रैकिंग और बैंक खातों की जांच के जरिए आरोपी देबाशीष राय को गोमती नगर एक्सटेंशन से गिरफ्तार किया गया। मात्र चार दिनों में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी और मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपा गया।
विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम) आलोक कुमार ने आरोपी को IPC की धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं और IT एक्ट की धारा 66D के तहत दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार की साइबर अपराध समाज में भय का वातावरण बनाते हैं, जिस पर सख्त कार्रवाई जरूरी है।
DCP साइबर क्राइम कमलेश दीक्षित ने जनता से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, खासकर जो खुद को सरकारी अधिकारी बताएं और डिजिटल गिरफ्तारी की धमकी दें, उनसे सावधान रहें। इस प्रकार की कॉल आने पर तुरंत उसे काटें और 1930 साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करें।
'डिजिटल अरेस्ट' एक नई साइबर ठगी की तकनीक है, जिसमें अपराधी खुद को सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं और पीड़ित को वीडियो कॉल पर कहते हैं कि वह अब वर्चुअल निगरानी में है। मानसिक दबाव बनाकर पीड़ित से पैसे ऐंठे जाते हैं। इस दौरान उन्हें कथित अदालत, चालान, या बेल के नाम पर रकम भेजने को मजबूर किया जाता है।