फेडरल सरकार ने सोमवार को संसद की सीनेट एस्टिमेट्स बैठक के दौरान यह साफ़ नहीं कहा कि भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने के नाम पर देश में गति सीमा घटाने का फैसला पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। इस अस्पष्ट रुख को लेकर विपक्ष ने सरकार पर कड़ा हमला बोला है।
रूरल एंड रीजनल अफेयर्स एंड ट्रांसपोर्ट लेजिस्लेशन कमेटी की सुनवाई में इन्फ्रास्ट्रक्चर मंत्री एंथनी चिशोल्म और विभागीय सचिव जिम बेट्स से नेशनल्स सांसद मैट कैनावन ने तीखे सवाल पूछे। हाल ही में ग्रामीण सड़कों की डिफॉल्ट स्पीड 100 किमी/घंटा से घटाकर 70 किमी/घंटा करने के प्रस्ताव को सरकार ने त्याग दिया था, लेकिन अब उस पर बने विवाद ने नया मोड़ ले लिया है।
सीनेटर कैनावन ने यह सवाल दागते हुए कहा कि सरकार के नेट-ज़ीरो लक्ष्य के नाम पर भविष्य में देशव्यापी सड़कों की रफ़्तार 50 किमी/घंटा तक सीमित करने जैसी बातें भी सामने आ सकती हैं।
इस पर मंत्री चिशोल्म ने जवाब दिया,
“यह राज्यों का अधिकार है। इस मुद्दे पर आगे कोई काम नहीं चल रहा है… लेकिन मैं ‘रूल-इन, रूल-आउट’ का खेल खेलने नहीं जा रहा।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्पीड लिमिट तय करने का नियम राज्य और क्षेत्रीय सरकारों के पास है और वही इस पर अंतिम फैसला लेते हैं।
लेकिन विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं हुआ।
नेशनल्स की सीनेटर ब्रिजेट मैकेंज़ी ने कहा कि मंत्री का जवाब दर्शाता है कि सरकार ने इस विकल्प को पूरी तरह बंद नहीं किया है। “तो फिर मामला खुला है,” कैनावन ने तंज कसा।
विवाद की जड़ एक परामर्श पत्र है जिसमें 100 किमी/घंटा की ग्रामीण डिफॉल्ट स्पीड लिमिट को घटाने के सुरक्षा लाभों के साथ-साथ संभावित कार्बन उत्सर्जन में कमी का भी उल्लेख किया गया था।
दस्तावेज़ में कहा गया कि अधिक गति से वाहन अधिक ईंधन जलाते हैं, जिससे CO₂ उत्सर्जन बढ़ता है।
इसी पहलू को लेकर विपक्ष का आरोप है कि सरकार सड़क सुरक्षा की आड़ में जलवायु नीति लागू करना चाह रही थी।
राज्य एवं क्षेत्रीय परिवहन मंत्रियों ने इस प्रस्ताव को “एक समान लागू होने वाला और अव्यावहारिक” बताते हुए खारिज कर दिया था, जिसके बाद केंद्र ने इसे वापस ले लिया।
फिर भी केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट आश्वासन न मिलने से यह मुद्दा राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है।