ऑस्ट्रेलिया की संसद में बॉन्डी आतंकी हमले के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के दौरान दिए गए कुछ बयानों को लेकर Australian Greens पार्टी विवादों में घिर गई है। यहूदी समुदाय और पीड़ित परिवारों का आरोप है कि शोक प्रस्तावों के मंच से ऐसे वक्तव्य दिए गए, जिनमें संवेदना के साथ-साथ राजनीतिक आरोप और यहूदी-विरोधी संकेत शामिल थे।
संसद में शोक व्यक्त करते हुए ग्रीन्स के कुछ सांसदों ने कहा कि—
“कुछ शक्तिशाली ताकतें इस नरसंहार का राजनीतिक रूप से फायदा उठा रही हैं।”
“इस त्रासदी का इस्तेमाल भय और नफरत को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।”
“कुछ समूह इस घटना को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए भुना रहे हैं।”
इन बयानों में किसी समूह या संगठन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया, लेकिन यहूदी समुदाय के नेताओं और पीड़ित परिवारों का कहना है कि “शक्तिशाली ताकतें” जैसे शब्द लंबे समय से यहूदी-विरोधी साजिश सिद्धांतों से जुड़े रहे हैं, इसलिए ऐसे संकेत अत्यंत आपत्तिजनक और पीड़ादायक हैं।
बॉन्डी हमले में मारे गए लोगों के परिजनों ने कहा कि शोक प्रस्तावों का उद्देश्य केवल मृतकों को सम्मान देना और पीड़ितों के साथ एकजुटता दिखाना होता है। उनके अनुसार,
ऐसे बयान शोक को राजनीतिक बहस में बदल देते हैं,
इससे पीड़ितों का दर्द और बढ़ता है,
और यहूदी समुदाय को अप्रत्यक्ष रूप से कटघरे में खड़ा किया जाता है।
यहूदी संगठनों ने मांग की है कि संसद में संवेदनशील मौकों पर भाषा का चयन बेहद सावधानी से किया जाए और किसी भी प्रकार के संकेतात्मक आरोपों से बचा जाए।
विपक्षी दलों ने ग्रीन्स पर आरोप लगाया कि उन्होंने श्रद्धांजलि के मंच का दुरुपयोग किया। विपक्ष का कहना है कि आतंकवादी हमलों जैसे मामलों में राजनीतिक टिप्पणियां सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाती हैं और संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं।
विवाद के बाद ग्रीन्स के नेताओं ने सफाई देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य किसी भी समुदाय, विशेषकर यहूदी समुदाय, को निशाना बनाना नहीं था। उनके अनुसार, वे केवल इस बात की चेतावनी देना चाहते थे कि किसी भी त्रासदी का राजनीतिक शोषण नहीं होना चाहिए। हालांकि आलोचकों का कहना है कि चाहे मंशा कुछ भी रही हो, शब्दों का चयन और मंच का उपयोग गलत था।
इस विवाद ने ऑस्ट्रेलिया में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शोक और संवेदना के अवसरों पर राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील क्षणों में नेताओं को अतिरिक्त जिम्मेदारी और संयम दिखाना चाहिए, ताकि पीड़ितों के प्रति सम्मान बना रहे और समाज में विभाजन न बढ़े।