फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के प्रस्तावित भारत दौरे से पहले रक्षा मंत्रालय भारतीय वायु सेना (IAF) की परिचालन क्षमता को मजबूत करने के लिए एक अहम रणनीतिक कदम उठाने जा रहा है। मंत्रालय 3.25 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के प्रस्ताव पर उच्च स्तरीय बैठक में विस्तार से चर्चा कर सकता है।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, यह बैठक अगले सप्ताह हो सकती है, जिसमें सौदे की लागत, स्वदेशी निर्माण, तकनीक हस्तांतरण और डिलीवरी टाइमलाइन जैसे अहम मुद्दों पर फैसला लिया जाएगा। इस प्रस्ताव को हाल ही में रक्षा खरीद बोर्ड (Defence Acquisition Board) से प्रारंभिक स्वीकृति मिल चुकी है।
भारतीय वायु सेना लंबे समय से फाइटर स्क्वाड्रन की भारी कमी का सामना कर रही है। पुराने मिग-21 विमानों को चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया जा रहा है, जबकि नए लड़ाकू विमानों की आपूर्ति अपेक्षित गति से नहीं हो पाई है। मौजूदा हालात में वायु सेना की परिचालन तैयारियों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
IAF की स्वीकृत स्क्वाड्रन संख्या: 42 स्क्वाड्रन
वर्तमान सक्रिय स्क्वाड्रन: लगभग 31–32 स्क्वाड्रन
इस तरह वायु सेना अभी भी अपनी स्वीकृत क्षमता से करीब 10–11 स्क्वाड्रन पीछे है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 114 नए राफेल विमान इस अंतर को काफी हद तक कम करने में मदद करेंगे।
इस प्रस्ताव की सबसे अहम विशेषता यह है कि करीब 80 प्रतिशत राफेल विमान भारत में ही निर्मित किए जाएंगे। इसके तहत फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी Dassault Aviation भारतीय रक्षा कंपनियों के साथ मिलकर उत्पादन करेगी।
इससे न केवल ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती मिलेगी, बल्कि रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक, कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
राफेल एक अत्याधुनिक मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जो हवा से हवा, हवा से जमीन और परमाणु हमले जैसे मिशनों को अंजाम देने में सक्षम है। इसमें अत्याधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें लगी होती हैं। भारतीय वायु सेना पहले ही राफेल के 36 विमान अपने बेड़े में शामिल कर चुकी है, जिनकी तैनाती रणनीतिक रूप से अहम ठिकानों पर की गई है।
मैक्रों की यात्रा से पहले इस सौदे पर चर्चा को भारत और फ्रांस के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। यदि यह सौदा आगे बढ़ता है, तो यह दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करेगा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सैन्य स्थिति को मजबूत करेगा।
हालांकि, रक्षा मंत्रालय की बैठक में चर्चा के बाद ही यह तय होगा कि प्रस्ताव को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास भेजा जाएगा या नहीं। अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ही सौदे की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी।