सिडनी/मेलबर्न। रूस पर पश्चिमी देशों की पाबंदियों के बावजूद ऑस्ट्रेलिया में बिक रहे पेट्रोल का बड़ा हिस्सा कथित तौर पर रूसी कच्चे तेल से तैयार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार का विश्लेषण करने वाली संस्थाओं ने खुलासा किया है कि रूस एक “घोस्ट फ्लीट” यानी छद्म जहाज़ों के नेटवर्क का उपयोग कर तेल को दुनिया भर में भेज रहा है—और इसका अंतिम ठिकाना ऑस्ट्रेलिया भी बन रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार घोस्ट फ्लीट ऐसे पुराने जहाज़ होते हैं जिनके
ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिए जाते हैं,
मालिकाना रिकॉर्ड अस्पष्ट होते हैं,
और समुद्र में बीच रास्ते जहाज़ों से-जहाज़ों में तेल ट्रांसफर किया जाता है।
इन तरीकों का उद्देश्य यह होता है कि तेल की वास्तविक उत्पत्ति—रूस—को छिपाया जा सके ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचकर तेल को एशियाई और अन्य बाज़ारों में बेचा जा सके।
जांचों के अनुसार प्रक्रिया कुछ यूँ चलती है—
रूस के बंदरगाहों से तेल ‘डार्क मोड’ में निकलने वाले टैंकरों पर लोड किया जाता है।
खुले समुद्र में यह तेल दूसरे जहाज़ों में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
ये जहाज़ बाद में किसी तीसरे देश के रिफाइनरी हब—जैसे सिंगापुर, मलेशिया या चीन—तक इसे पहुंचाते हैं।
वहाँ तेल को “नॉन-रशियन” ब्लेंड बताकर प्रोसेस किया जाता है और फिर ऑस्ट्रेलिया को एक्सपोर्ट किया जाता है।
इस जटिल नेटवर्क के कारण ऑस्ट्रेलियाई आयात रिकॉर्ड में तेल की उत्पत्ति रूसी नहीं बल्कि “मिश्रित” या “अन्य देश” के रूप में दर्ज होती है।
जानकारों का दावा है कि पिछले दो वर्षों में ऑस्ट्रेलियाई उपभोक्ताओं ने अरबों डॉलर उस पेट्रोल पर खर्च किए हैं, जिसकी कच्ची आपूर्ति के पीछे रूसी स्रोत शामिल हो सकते हैं।
सरकार ने रूस से सीधे किसी भी तेल या ऊर्जा उत्पाद पर प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन अप्रत्यक्ष आयात की इस परतदार प्रणाली पर नियंत्रण मुश्किल साबित हो रहा है।
रूस–यूक्रेन युद्ध के मद्देनज़र ऑस्ट्रेलिया सहित पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ऊर्जा व्यापार पर सख्ती की है। लेकिन यह घोस्ट फ्लीट नेटवर्क दिखाता है कि
वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला
और समुद्री लॉजिस्टिक्स
कितने बड़े स्तर पर प्रतिबंधों को दरकिनार करने में सक्षम हैं।
कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस व्यवस्था पर रोक नहीं लगी तो प्रतिबंधों का असर कमज़ोर होगा और युद्ध वित्तपोषण पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने कहा है कि वे अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर तेल की उत्पत्ति के ट्रैकिंग सिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं। वहीं, पेट्रोल कंपनियों का दावा है कि वे केवल “कानूनी रूप से मान्य” आयात स्रोतों से ही उत्पाद खरीदते हैं और हर शिपमेंट के दस्तावेज़ परीक्षण के दायरे में आते हैं।