नई दिल्ली।
अमेरिका से लेकर यूरोप तक के शीर्ष नेताओं की एक साथ भारत मौजूदगी ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका को रेखांकित कर दिया है। एक ओर जहां यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी भारत–यूरोप संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी का संकेत दे रही है, वहीं अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल की यात्रा भारत–अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के हालिया अनुमानों के अनुसार भारत वर्ष 2026 में विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे समय में भारत का वैश्विक मंच पर बढ़ता आकर्षण कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा भारत पहुंच चुके हैं। उनके साथ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भी नई दिल्ली में मौजूद हैं। दोनों नेता 26 जनवरी को आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। इसके बाद 27 जनवरी को होने वाले 16वें भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
यूरोपीय संघ इस प्रस्तावित समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील” के रूप में देख रहा है। यदि यह समझौता साकार होता है, तो यह भारत और यूरोप के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला सहयोग को नई दिशा देगा।
इसी क्रम में अमेरिकी कांग्रेस का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत पहुंचा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में इस प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग और यूक्रेन संकट जैसे अहम वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ।
विदेश मंत्री ने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि कांग्रेसनल संवाद भारत–अमेरिका संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है और दोनों देशों के बीच रणनीतिक समझ को आगे बढ़ाने में इसकी अहम भूमिका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और यूरोप दोनों की एक साथ सक्रियता यह दर्शाती है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। आर्थिक शक्ति, भू-राजनीतिक संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों के चलते भारत की भूमिका आने वाले वर्षों में और निर्णायक होने की संभावना है।