भारत को ‘सनातन’ दृष्टिकोण अपनाना होगा: मोहन भागवत

भारत को ‘सनातन’ दृष्टिकोण अपनाना होगा: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में भारत के लिए ‘सनातन दृष्टिकोण’ को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश को अपनी विकास यात्रा का मार्ग खुद तय करना होगा और इसके लिए परंपरागत जीवन दृष्टि को अपनाना जरूरी है।

दुनिया की बंटी हुई नीतियों पर प्रहार

भागवत ने कहा कि आज जो हालात बने हैं, वे दुनिया की पिछले दो हजार वर्षों से चली आ रही विभाजित नीतियों का नतीजा हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को इससे मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, बल्कि अपनी राह खुद बनानी चाहिए। उन्होंने कहा, “समाधान हमें ढूंढ़ना होगा। भविष्य में भी ऐसी चुनौतियां आएंगी, क्योंकि दुनिया के इस बंटे दृष्टिकोण में ‘मैं’ और ‘हम’ का फर्क बना रहता है।”

चार पुरुषार्थों पर बल

आरएसएस प्रमुख ने भारत की प्राचीन जीवन दृष्टि का उल्लेख करते हुए चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – को अपनाने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह वह प्राकृतिक नियम है जो सभी को साथ लेकर चलने का मार्ग दिखाता है।

अमेरिकी नीतियों का जिक्र

कार्यक्रम के दौरान भागवत ने एक अमेरिकी व्यक्ति से अपनी मुलाकात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि तीन साल पहले उस व्यक्ति ने भारत-अमेरिका सहयोग की संभावनाओं की चर्चा की थी, लेकिन हर बार यह शर्त रखी कि अमेरिकी हित पहले सुरक्षित होने चाहिए। भागवत ने कहा कि अलग-अलग हितों के चलते संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।

पर्यावरण पर भारत की प्रतिबद्धता

भागवत ने यह भी कहा कि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने पर्यावरणीय मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह निभाया है। उन्होंने कहा कि यदि भारत हर संघर्ष में कूदता, तो 1947 से अब तक लगातार युद्धरत रहता, लेकिन हमने संघर्षों का सामना शांति से किया और युद्ध को टाला।

भारत को ‘विश्वगुरु’ और ‘विश्वमित्र’ बनाने की बात

भागवत ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारत को ‘विश्वगुरु’ और ‘विश्वमित्र’ बनने के लिए अपनी विशेष दृष्टि अपनानी होगी। उन्होंने कहा, “हमारा दृष्टिकोण पारंपरिक है, लेकिन यह पुराना नहीं है, यह ‘सनातन’ है। अर्थ और काम भी जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन वे धर्म से जुड़े रहने चाहिए।”