सिडनी। ऑस्ट्रेलिया की अल्बनीज़ (Anthony Albanese) सरकार और न्यू साउथ वेल्स (NSW) के मुख्यमंत्री क्रिस मिन्स (Chris Minns) एक नए विवाद में घिर गए हैं। आरोप है कि दोनों सरकारों ने सिडनी स्थित एक इस्लामी केंद्र को अनुदान दिया, जिसके कुछ कार्यक्रम और प्रवचन ईरान समर्थक एवं इज़राइल विरोधी कट्टर विचारधारा से जुड़े पाए गए हैं।
ऑस्ट्रेलियाई अख़बार The Australian की एक विशेष रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सिडनी के इस्लामी केंद्र ने पहले ऐसे धार्मिक नेताओं को आमंत्रित किया था, जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से इज़राइल के विरुद्ध उग्र बयान दिए।
कुछ मौलवियों ने अपने भाषणों में यहूदी समुदाय के प्रति नफरत भरी बातें कही और यहाँ तक कि “इज़राइल को नक्शे से मिटा देने” जैसी टिप्पणियाँ भी कीं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन नेताओं का सीधा वैचारिक संबंध ईरान की सरकार और उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई से जोड़ा गया है।
यह भी सामने आया कि केंद्र की गतिविधियों में ईरान समर्थक विचारों को मंच दिया जाता है, जो ऑस्ट्रेलिया की विदेश नीति और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जा रहा है।
ऑस्ट्रेलियाई संघीय सरकार और NSW राज्य सरकार दोनों ने इस केंद्र को सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहयोग प्रदान किया।
आलोचकों का कहना है कि अनुदान जारी करते समय केंद्र की पृष्ठभूमि और गतिविधियों की पर्याप्त जांच नहीं की गई।
विपक्ष ने इस मामले में पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा कि यह जानना ज़रूरी है कि क्या सरकारी धन कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने में इस्तेमाल हो रहा है।
विपक्षी नेताओं ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी संवेदनशील संस्थाओं को वित्त पोषण करना राष्ट्र सुरक्षा और सामाजिक एकता के लिए ख़तरा बन सकता है।
इस विवाद से ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम समुदाय और अन्य धर्मों के बीच तनाव पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
समर्थक पक्ष का तर्क है कि हर धार्मिक संस्था को धार्मिक स्वतंत्रता और समान अवसर का अधिकार है।
जबकि आलोचक मानते हैं कि यदि किसी संस्था का इस्तेमाल राजनीतिक या उग्र धार्मिक एजेंडा फैलाने में हो रहा है, तो यह सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ सकता है।
यह बहस भी उठी है कि सरकार को धार्मिक संस्थाओं के लिए वित्तीय सहायता देते समय और कठोर जांच-पड़ताल की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला ऑस्ट्रेलिया में धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस को और गहरा कर सकता है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि केंद्र वास्तव में कट्टरपंथी विचारों का प्रसार कर रहा है, तो सरकार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी होगी।
वहीं, अगर आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, तो यह मुस्लिम समुदाय के प्रति गलत संदेश भी भेज सकता है।
फिलहाल सरकार ने इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। लेकिन विपक्ष और मीडिया के दबाव को देखते हुए संभावना है कि जल्द ही अनुदान प्रक्रिया, केंद्र की गतिविधियों और संबंधित नेताओं के भाषणों की जांच शुरू की जाएगी।
यह मामला ऑस्ट्रेलियाई राजनीति के लिए एक संवेदनशील मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि यह न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है।