उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म संबंधी बयान को मद्रास हाईकोर्ट ने बताया हेट स्पीच

अदालत की सख्त टिप्पणी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा रेखांकित

उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म संबंधी बयान को मद्रास हाईकोर्ट ने बताया हेट स्पीच

चेन्नई।
तमिलनाडु सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म को लेकर दिए गए विवादित बयान पर मद्रास हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि सनातन धर्म को समाप्त करने जैसे शब्दों का प्रयोग स्पष्ट रूप से एक धर्म पर हमला है और इसे हेट स्पीच की श्रेणी में रखा जा सकता है।

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी धर्म या आस्था को समाप्त करने की बात करना केवल आलोचना नहीं, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक पहचान पर सीधा आघात है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की भी एक सीमा होती है और इसके नाम पर नफरत फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

क्या था विवादित बयान

दरअसल, वर्ष 2023 में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से करते हुए कहा था कि इसका विरोध ही नहीं, बल्कि इसे खत्म किया जाना चाहिए। इस बयान के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी और कई संगठनों ने इसे हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी बताया था।

अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि “सनातन धर्म को खत्म करने” जैसी बातों को शब्दशः लिया जाए, तो इसका अर्थ उस धर्म को मानने वाले लोगों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाना है। अदालत के अनुसार, ऐसी भाषा सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाली है और इसे सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं माना जा सकता।

एफआईआर रद्द, लेकिन बयान पर सवाल बरकरार

हालांकि, इस मामले में अदालत ने भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया, जिन्होंने सोशल मीडिया पर उदयनिधि स्टालिन के बयान की आलोचना की थी। कोर्ट ने कहा कि किसी बयान पर सवाल उठाना या उसकी आलोचना करना अपराध नहीं है।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राथमिकी रद्द करने का अर्थ यह नहीं है कि मूल बयान को सही ठहराया जा रहा है।

राजनीतिक हलकों में तेज़ प्रतिक्रिया

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद राजनीतिक माहौल फिर गर्मा गया है। विपक्षी दलों ने इसे सनातन धर्म पर दिए गए बयान की न्यायिक पुष्टि बताया है, जबकि सत्तारूढ़ दल की ओर से कहा जा रहा है कि पूरे मामले को संदर्भ से अलग कर राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

महत्वपूर्ण संदेश

इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सम्मान के बीच संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। अदालत की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।