ईरान से 5 लाख से अधिक अफगानियों की वापसी, साल के अंत तक 30 लाख की घर-वापसी की उम्मीद — क्यों ईरान और पाकिस्तान चला रहे हैं 'मास डिपोर्टेशन'?

ईरान से 5 लाख से अधिक अफगानियों की वापसी, साल के अंत तक 30 लाख की घर-वापसी की उम्मीद — क्यों ईरान और पाकिस्तान चला रहे हैं 'मास डिपोर्टेशन'?

पिछले कुछ हफ्तों में ईरान ने एक बड़ा मानवीय कदम उठाते हुए 5 लाख से अधिक अफगान नागरिकों को जबरन देश से बाहर निकाल दिया है। यह सिलसिला पाकिस्तान द्वारा लाखों अफगानियों को वापस भेजने के निर्णय के बाद शुरू हुआ था। अब साल के अंत तक अनुमान है कि लगभग 30 लाख अफगानी शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजा जा सकता है। यह कदम न केवल अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के लिए चुनौती है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।

क्या है 'मास डिपोर्टेशन' का कारण?

1. आंतरिक दबाव और अर्थव्यवस्था:

ईरान और पाकिस्तान जैसे देश आर्थिक संकट और बढ़ती बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। शरणार्थियों पर बढ़ता बोझ अब स्थानीय लोगों के लिए भी असहजता पैदा कर रहा है। ईरान में बढ़ती महंगाई और संसाधनों की कमी के चलते सरकार ने यह कठोर कदम उठाया है।

2. सुरक्षा कारण:

ईरान को डर है कि अफगान शरणार्थियों के बीच आतंकवादियों की घुसपैठ हो सकती है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है।

3. राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय समीकरण:

इस्राइल-गाजा संघर्ष के बाद क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है। ईरान अपनी सीमाओं पर नियंत्रण और राजनीतिक स्पष्टता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान सरकार के लिए बड़ी चुनौती

वर्तमान में अफगानिस्तान में रोजगार की भारी कमी है। महिलाओं की शिक्षा और काम पर रोक, विदेशी सहायता में कटौती और अस्थिर शासन प्रणाली के कारण वापस लौट रहे अफगानियों को समायोजित करना तालिबान के लिए बेहद कठिन है। तालिबान ने अभी तक कोई ठोस योजना नहीं बताई है कि इतने बड़े पैमाने पर लौट रहे नागरिकों को कैसे बसाया जाएगा।

मानवीय संकट गहराया

अधिकतर अफगानी नागरिक बिना किसी तैयारी या समर्थन के वापस लौट रहे हैं। इनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं। सीमावर्ती इलाकों में खाने, दवा और छत की भारी कमी है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द नहीं संभले तो एक और मानवीय संकट पैदा हो सकता है।

निष्कर्ष

ईरान और पाकिस्तान की तरफ से चलाया जा रहा यह मास डिपोर्टेशन अभियान अफगानिस्तान को एक नई सामाजिक और आर्थिक चुनौती की ओर धकेल सकता है। यह जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन, इस मसले पर त्वरित और संवेदनशील हस्तक्षेप करें ताकि शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके और अफगानिस्तान को आवश्यक सहायता मिल सके।