ब्रिसबेन – क्वींसलैंड की सड़कों पर लगे मोबाइल और सीट बेल्ट कैमरों ने ऐसा नज़ारा दिखाया है जिसने ट्रैफिक अधिकारियों की चिंता और बढ़ा दी है। कोई अपने घुटनों से गाड़ी चला रहा है, तो कोई कुत्ते को गोद में रखकर मोबाइल में व्यस्त है — यह दृश्य न केवल खतरनाक हैं, बल्कि कानून की सरेआम अवहेलना भी हैं।
2021 से अब तक ₹3,000 करोड़ से अधिक जुर्माने वसूले
क्वींसलैंड सरकार ने नवंबर 2021 से अब तक मोबाइल और सीट बेल्ट उल्लंघन के 4.61 लाख मामलों से 500 मिलियन डॉलर (करीब ₹3,340 करोड़) से अधिक जुर्माना वसूला है।
RACQ की 2025 की वार्षिक सुरक्षा सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 27% क्वींसलैंड निवासी खुद मानते हैं कि उन्होंने ड्राइविंग के दौरान ध्यान भटकाया। इनमें से 41% लोग रास्ता देखने के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, 33% म्यूजिक सुनने और 30% लोग टेक्स्टिंग करते पाए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि 11% लोग सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हुए गाड़ी चलाते हैं।
₹75,000 से ज्यादा के जुर्माने और अंक कटौती का खतरा
जो भी ड्राइवर मोबाइल का इस्तेमाल करते पकड़े जाते हैं, उन्हें $1,251 (करीब ₹75,000) का जुर्माना और 4 डिमेरिट पॉइंट्स काटे जाते हैं। इतना ही जुर्माना उन लोगों पर भी लगाया जाता है जो सीट बेल्ट नहीं पहनते या गलत तरीके से पहनते हैं। अकेले सीट बेल्ट उल्लंघन से ही सरकार को पिछले 12 महीनों में $161 मिलियन (करीब ₹1,075 करोड़) की आमदनी हुई है।
'कानून की खुल्लमखुल्ला अवहेलना'
RACQ के प्रमुख डॉ. माइकल कान ने कहा, "लोग जानते हैं कि ड्राइविंग करते समय मोबाइल का इस्तेमाल और बिना सीट बेल्ट के चलना गलत है, फिर भी वे अपनी और दूसरों की जान खतरे में डालते हैं।"
देशभर में चिंता का माहौल
सिर्फ क्वींसलैंड ही नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अन्य राज्य भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। न्यू साउथ वेल्स में हाल ही में 84,000 मोबाइल जुर्माने 20 से 30 साल के युवाओं को दिए गए — यह किसी भी अन्य आयु वर्ग से सबसे अधिक है।
विक्टोरिया सरकार ने भी मोबाइल कैमरों की नई तकनीक का परीक्षण शुरू किया है क्योंकि राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या 8.6% बढ़कर 289 हो गई है।
सरकार और नागरिकों की जिम्मेदारी
यह साफ है कि तकनीक ने नियम तोड़ने वालों को पकड़ना आसान बना दिया है, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब लोग खुद नियमों का पालन करने लगें। मोबाइल की लत और सीट बेल्ट की लापरवाही केवल जुर्माने का नहीं, बल्कि जान का सवाल है।