ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन द्वारा इस्लामिक संस्थानों पर कड़ी निगरानी और आतंकवाद विरोधी सुधारों की मांग को देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि मॉरिसन का तर्क “त्रुटिपूर्ण” है और वह यह समझने में असफल रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया का मुस्लिम समुदाय पहले से ही कट्टरपंथ के खिलाफ प्रभावी आंतरिक व्यवस्था लागू किए हुए है।
सिडनी के वरिष्ठ मुस्लिम नेता और ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया से सम्मानित डॉ. जमाल रिफी ने कहा कि मुख्यधारा का मुस्लिम समाज पहले ही ऐसे “जाँच और संतुलन” तंत्र विकसित कर चुका है, जिनके कारण चरमपंथी विचारधाराओं को समुदाय के भीतर पनपने का अवसर नहीं मिलता।
डॉ. रिफी ने कहा,
“मैं स्कॉट मॉरिसन की कुछ चिंताओं और भावनाओं से सहमत हूँ, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई मुस्लिम समुदाय के लिए जिन सुधारों की वह बात कर रहे हैं, वे न तो ज़मीनी हकीकत को दर्शाते हैं और न ही वांछित परिणाम देंगे।”
मॉरिसन ने हाल ही में एक ऑस्ट्रेलियाई अख़बार में लिखे लेख और यरुशलम में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान इस्लामिक नेतृत्व पर अधिक सरकारी निगरानी की वकालत की थी। उनके इस रुख़ को यहूदी समुदाय के एक प्रमुख संगठन के नेताओं का समर्थन भी मिला।
हालांकि, मुस्लिम नेताओं ने इस बात पर सवाल उठाया कि ऐसे बयान विदेश में, विशेष रूप से इज़राइल में, और मौजूदा वैश्विक तनाव के माहौल में क्यों दिए गए। इसके बावजूद डॉ. रिफी ने मॉरिसन की मंशा पर संदेह जताने से इनकार किया।
उन्होंने कहा,
“मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। मेरा मानना है कि उनकी बात किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के साझा हित की भावना से प्रेरित है।”
यह विवाद दिसंबर में सिडनी के बॉन्डी इलाके में हुए आतंकी हमले के बाद देश में बढ़ती यहूदी-विरोधी घटनाओं और चरमपंथ पर जारी बहस के बीच सामने आया है।
एक अलग लेख में मॉरिसन ने चेतावनी दी कि 7 अक्टूबर के बाद ऑस्ट्रेलिया में यहूदी-विरोधी घटनाओं में तेज़ उछाल आया है और समाज ने इसे रोकने में गंभीरता नहीं दिखाई। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हाल के वर्षों में ऐसी घटनाएं कई गुना बढ़ी हैं।
मॉरिसन ने यह भी तर्क दिया कि यहूदी-विरोध अब केवल कट्टर दक्षिणपंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रगतिशील वामपंथ में भी “एंटी-ज़ायनिज़्म” के रूप में दिखाई दे रहा है। साथ ही उन्होंने कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा को एक अलग और गंभीर खतरा बताया, यह कहते हुए कि हालिया हमलों के आरोपी “ऑस्ट्रेलिया में ही कट्टरपंथी बने”, न कि विदेश में।
मुस्लिम समुदाय के नेताओं का कहना है कि आतंकवाद और नफ़रत के खिलाफ लड़ाई सामूहिक प्रयास से ही संभव है, लेकिन किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर बनाए गए नीतिगत प्रस्ताव सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकते हैं।