इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास गाजा युद्ध को समाप्त करने और बचे हुए इज़राइली बंधकों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ तीन महीने का समय है। यह चेतावनी प्रमुख राजनीतिक विश्लेषकों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने दी है, क्योंकि गाजा पट्टी में तेजी से बिगड़ते भूख संकट को लेकर वैश्विक नाराजगी बढ़ती जा रही है।
राजनीतिक विराम में राहत, लेकिन चुनौतीपूर्ण समय
इज़राइल की संसद 'केसेट' ने हाल ही में अपनी तीन महीने की गर्मियों की छुट्टियों की घोषणा की है। इस दौरान कोई नया विधेयक पास नहीं होगा और न ही सरकार को गिराने की कोई कोशिश की जा सकेगी। इस राजनीतिक विराम को नेतन्याहू के लिए एक “तीन महीने की राजनीतिक शांति” के रूप में देखा जा रहा है – जो उन्हें गाजा नीति में बदलाव करने और रणनीति सुधारने का मौका देता है, बिना किसी तात्कालिक सत्ता संकट के।
"जैसा युद्ध चल रहा है, उससे लक्ष्य नहीं मिल रहे"
यरुशलम स्थित इज़राइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के प्रमुख योहानन प्लेसनर ने 'वॉशिंगटन पोस्ट' से बात करते हुए कहा, "यह महसूस किया जा रहा है कि जिस तरीके से युद्ध चलाया जा रहा है, वह न तो बंधकों की वापसी सुनिश्चित कर रहा है और न ही इज़राइल के रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा कर रहा है।"
स्थानीय दबाव भी बढ़ रहा है
हाल ही में किए गए एक जनमत सर्वेक्षण में इज़राइली जनता की भावना स्पष्ट रूप से सामने आई है। चैनल 12 द्वारा किए गए इस सर्वे के मुताबिक, 74% नागरिकों – जिनमें नेतन्याहू के 60% समर्थक भी शामिल हैं – एक ऐसे समझौते का समर्थन करते हैं जिसमें सभी बंधकों को एक साथ छोड़ा जाए और युद्ध समाप्त किया जाए। सर्वे में 49% लोगों का मानना है कि नेतन्याहू की ‘चरणबद्ध रिहाई’ की नीति राजनीतिक कारणों से प्रेरित है, जबकि 36% इसे सुरक्षा कारणों से उचित मानते हैं।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और मानवीय राहत की कोशिशें
इज़राइली सरकार ने हाल ही में कुछ अहम मानवीय फैसले लिए हैं, जिनमें गाजा में कुछ हिस्सों में “रणनीतिक युद्धविराम” की घोषणा और भोजन की हवाई आपूर्ति शामिल है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अन्य संगठनों को सुरक्षित जमीनी मार्गों से राहत सामग्री पहुँचाने की अनुमति दी गई है।
नेतन्याहू की राजनीतिक साख दांव पर
वर्ष 2026 में संभावित आम चुनावों से पहले नेतन्याहू पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वे राजनीतिक लाभ के लिए युद्ध को अनावश्यक रूप से खींच रहे हैं – जिसे वे बार-बार खारिज करते आए हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि अगर तीन महीनों के भीतर कोई ठोस परिणाम नहीं आता, तो उनकी नेतृत्व क्षमता पर बड़ा सवाल खड़ा हो सकता है।