ब्रिटेन की राजनीति में निगेल फराज की चौंकाने वाली बढ़त – ऑस्ट्रेलिया में असंभव!

ब्रिटेन की राजनीति में निगेल फराज की चौंकाने वाली बढ़त – ऑस्ट्रेलिया में असंभव!

ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, और इस परिवर्तन के केंद्र में हैं विवादास्पद राजनेता निगेल फराज। हाल ही में सम्पन्न यूरोपीय संसद चुनावों और उपचुनावों में उनकी पार्टी रिफॉर्म यूके ने अप्रत्याशित प्रदर्शन किया है, जिससे ब्रिटिश पारंपरिक राजनीति की जड़ें हिलती दिख रही हैं।

जहां एक ओर कंज़र्वेटिव पार्टी को अपने पारंपरिक मतदाताओं से समर्थन नहीं मिल रहा, वहीं लेबर पार्टी भी आपसी मतभेदों और रणनीतिक भ्रम का सामना कर रही है। इस राजनीतिक शून्य का लाभ उठाते हुए फराज ने जन-आक्रोश, राष्ट्रवाद और आव्रजन विरोधी नारों के सहारे अपनी पार्टी को मुख्यधारा में ला खड़ा किया है।

ब्रिटेन बनाम ऑस्ट्रेलिया: लोकतांत्रिक तंत्र की तुलना

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा राजनीतिक उलटफेर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में संभव नहीं है। वहां का अनिवार्य और वरीयताक्रम आधारित मतदान तंत्र (compulsory & preferential voting system) पारंपरिक दो-पार्टी ढांचे को मजबूत बनाए रखता है। ऑस्ट्रेलिया में मतदाता को वोट डालना कानूनी रूप से अनिवार्य है, और उम्मीदवारों को वरीयता के आधार पर क्रमबद्ध किया जाता है, जिससे छोटे या चरमपंथी दलों को सत्ता में आने का मौका बहुत कम मिलता है।

ब्रिटेन में जनता क्यों टूटी पारंपरिक पार्टियों से?

ब्रेक्ज़िट, जीवन-यापन संकट, स्वास्थ्य सेवा की जर्जर हालत और बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर मुख्यधारा की पार्टियाँ समाधान नहीं दे पाईं। इसका लाभ फराज जैसे नेताओं को मिला, जिन्होंने "साधारण नागरिक बनाम राजनीतिक अभिजात्य वर्ग" का नैरेटिव गढ़ा।

लोकतंत्र पर खतरा या जनमत की जीत?

राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि भले ही फराज की बढ़त जनता की नाराज़गी को दिखाती हो, लेकिन इस तरह की जनसंवेदनशील राजनीति लोकतंत्र को ध्रुवीकृत और अस्थिर भी बना सकती है।