पाकिस्तान ने ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम को समर्थन देने की सार्वजनिक घोषणा कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और नव-निर्वाचित ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान में पाकिस्तान ने कहा कि ईरान को अपने "शांतिपूर्ण परमाणु अधिकारों" का पूरा हक है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और इजरायल पहले ही ईरान पर गहरे संदेह जाहिर कर चुके हैं कि वह अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम की आड़ में परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। पाकिस्तान का यह रुख वॉशिंगटन और तेल अवीव दोनों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
इस्लामाबाद में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा,
"ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है। हम ईरान के अधिकारों का सम्मान करते हैं और उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।"
उन्होंने साथ ही कहा कि क्षेत्रीय सहयोग और संप्रभुता का सम्मान दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में स्थिरता के लिए ज़रूरी है।
पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह समर्थन पाकिस्तानी सेना की सहमति से हुआ है? यदि हां, तो अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका ने पहले ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को "वैश्विक खतरा" बताया है। ऐसे में पाकिस्तान जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश द्वारा ईरान को समर्थन देना वॉशिंगटन को कड़ी प्रतिक्रिया देने पर मजबूर कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य सहायता पर असर झेलना पड़ सकता है।
इजरायल के लिए यह कदम और भी गंभीर है। वह पहले ही ईरान की परमाणु क्षमता को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है और कई बार ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमला करने की चेतावनी दे चुका है।