पर्थ, 21 फरवरी 2026।
ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में एक कथित ‘एंटी-होमलेस’ (बेघर लोगों को दूर रखने वाला) उपकरण लगाए जाने के बाद स्थानीय प्रशासन को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर मामला सामने आने के बाद इसे “अमानवीय” और “गैर-ऑस्ट्रेलियाई” कदम बताया गया। बढ़ते विरोध के बीच परिषद ने अगले ही दिन यह उपकरण हटा दिया।
यह उपकरण लॉर्ड स्ट्रीट ब्रिज के नीचे लगाया गया था। आरोप है कि यह एक तेज, ऊंची आवृत्ति की कर्कश ध्वनि उत्पन्न करता था, जिससे वहां रुकने या सोने की कोशिश करने वाले बेघर लोग असहज महसूस करें और स्थान छोड़ दें।
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के प्रीमियर रोजर कुक ने प्रेस वार्ता में कहा कि उन्हें इस उपकरण की जानकारी नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय “उच्च स्तर पर नहीं लिया गया”।
उन्होंने कहा, “हम पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में बेघर लोगों को प्रताड़ित करने या उनके लिए जीवन और कठिन बनाने की नीति का समर्थन नहीं करते। वे पहले से ही कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं।”
स्वतंत्र मीडिया प्रकाशन “द लास्ट प्लेस ऑन अर्थ” के संस्थापक जेसी नोएक्स ने सप्ताहांत में एक वीडियो साझा किया, जिसमें पुल के नीचे से आ रही तीखी आवाज़ सुनी जा सकती थी। वीडियो में उन्होंने कहा कि यह ध्वनि जानबूझकर इस तरह तैयार की गई है ताकि लोग वहां डेरा न डाल सकें।
यह अंडरपास पिछले कुछ वर्षों में अस्थायी ‘टेंट सिटी’ के रूप में जाना जाता रहा है, जहां कई बेघर लोग शरण लेते थे। बाद में आग की घटनाओं के चलते उस इलाके को खाली कराया गया था।
ब्रिज के पास स्थित गैर-लाभकारी संस्था सेंट बार्ट्स में रहने वाले 47 वर्षीय रिचर्ड ने बताया कि उपकरण लगाए जाने के बाद वहां कोई भी बेघर व्यक्ति नहीं दिखा। उन्होंने कहा कि इस तरह के उपाय समस्या का समाधान नहीं हैं, बल्कि पहले से संघर्ष कर रहे लोगों के लिए मुश्किलें और बढ़ाते हैं।
बुधवार को उपकरण हटाए जाने के बाद क्षेत्र में सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू हो गईं। सुबह के समय वहां धावक, साइकिल सवार और कुछ बेघर लोग भी नजर आए।
इस घटना के बाद ‘होस्टाइल आर्किटेक्चर’ यानी ऐसी शहरी संरचनाओं पर बहस तेज हो गई है, जिनका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों से बेघर लोगों को दूर रखना होता है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसी नीतियां समस्या की जड़ पर काम करने के बजाय उसे छिपाने का प्रयास हैं।
स्थानीय प्रशासन ने फिलहाल उपकरण हटाने की पुष्टि की है, लेकिन इस मामले ने बेघर लोगों के प्रति सरकारी नीतियों और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।