सोमवार को आयोजित होने वाली इनवेज़न डे रैलियों को लेकर देशभर में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं। अधिकारियों के अनुसार इस वर्ष इन प्रदर्शनों में प्रो-फिलिस्तीन समर्थक समूहों की संख्या बढ़ने की संभावना है, जिससे कार्यक्रमों की दिशा और संदेश को लेकर नई चिंताएं सामने आ रही हैं।
इनवेज़न डे, जिसे कई आदिवासी समुदाय ऑस्ट्रेलिया डे के विरोध के रूप में मनाते हैं, ऐतिहासिक रूप से स्वदेशी लोगों के अधिकारों, उपनिवेशवाद के प्रभावों और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रहा है। हालांकि हालिया अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के चलते कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा फिलिस्तीन समर्थन से जुड़े नारे और प्रतीक शामिल किए जाने की आशंका जताई जा रही है।
आदिवासी नेताओं और आयोजकों ने आशंका व्यक्त की है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों की भागीदारी से इनवेज़न डे का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। उनका कहना है कि यह दिन स्वदेशी समुदायों के संघर्ष, इतिहास और अधिकारों को उजागर करने के लिए है, न कि किसी अन्य वैश्विक संघर्ष का मंच बनने के लिए।
कुछ सामाजिक संगठनों ने यह भी कहा है कि विभिन्न आंदोलनों के आपसी जुड़ाव को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन प्राथमिकता आदिवासी आवाज़ों को मिलनी चाहिए।
पुलिस अधिकारियों ने पुष्टि की है कि बड़े शहरों और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की अनुमति है, लेकिन किसी भी प्रकार की अव्यवस्था, हिंसा या नफरत फैलाने वाली गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम सभी समुदायों के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करते हैं, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है।”
रैलियों के आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों से संयम और अनुशासन बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहने चाहिए और किसी भी प्रकार की उत्तेजक भाषा या प्रतीकों से बचा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष की इनवेज़न डे रैलियां सामाजिक एकजुटता और वैचारिक टकराव — दोनों का प्रतीक बन सकती हैं। ऐसे में प्रशासन, आयोजकों और प्रतिभागियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य से न भटके।