कैनबरा। ऑस्ट्रेलियाई लिबरल पार्टी में जलवायु नीति को लेकर आंतरिक संघर्ष खुलकर सामने आ गया है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के वरिष्ठ सांसद एंड्रू हैस्टी ने पार्टी की डिप्टी लीडर सुसन ले पर दबाव डालते हुए 2050 तक ‘नेट ज़ीरो’ उत्सर्जन लक्ष्य को त्यागने की मांग की है। हैस्टी का कहना है कि यह लक्ष्य “देश की आर्थिक स्वतंत्रता और विकास क्षमता को जकड़ने वाला बंधन” बन चुका है।
इस विवाद में दक्षिणपंथी राजनीतिक अभियान समूह एडवांस ऑस्ट्रेलिया ने भी हस्तक्षेप किया है। समूह ने हाल ही में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के लिबरल नेता बेसिल ज़ेम्पिलास को कठोर शब्दों में निशाना बनाया, उन्हें “कमज़ोर” और “हारनेवाला” बताते हुए सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि यदि अन्य सांसद भी ‘नेट ज़ीरो’ लक्ष्य का समर्थन करेंगे, तो उन्हें भी इसी तरह “बेहद आक्रामक प्रचार” का सामना करना पड़ेगा।
एडवांस का आरोप है कि ज़ेम्पिलास पार्टी के भीतर आम सदस्यों और कार्यकर्ताओं की राय के खिलाफ जाकर जलवायु प्रतिबद्धताओं पर टिके हुए हैं।
हैस्टी और ज़ेम्पिलास के बीच मतभेद पिछले कई हफ्तों से गहराते जा रहे हैं। हैस्टी का कहना है कि लिबरल पार्टी को सदस्यता-आधारित निर्णयों का सम्मान करना चाहिए, और यदि पार्टी के ग्रासरूट प्रतिनिधि ‘नेट ज़ीरो’ छोड़ने का प्रस्ताव पारित करते हैं, तो नेतृत्व को इसे लागू करना चाहिए।
दूसरी ओर, ज़ेम्पिलास का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु लक्ष्यों से पीछे हटना ऑस्ट्रेलिया की साख को नुकसान पहुंचाएगा और चुनावी रणनीति के लिहाज़ से भी यह गलत कदम होगा।
हैस्टी का तर्क है कि ऑस्ट्रेलिया एक तरफ कोयला और गैस का बड़ा निर्यातक है, जबकि घरेलू स्तर पर ऊर्जा उत्पादन पर कड़े जलवायु नियम लागू करता है। उनके मुताबिक, यह “नीतिगत दोगलापन” है और देश को प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल रहा है।
वहीं, ज़ेम्पिलास और उनके समर्थकों का कहना है कि जलवायु लक्ष्यों को छोड़ने से युवा मतदाताओं और शहरी क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ और कमजोर होगी—जो पहले से ही 2022 और 2025 के चुनावों में दिखाई दे चुका है।
यह टकराव लिबरल पार्टी में दो स्पष्ट खेमों को उजागर करता है—एक ओर दक्षिणपंथी धड़ा, जो जलवायु लक्ष्यों को आर्थिक बोझ मानता है और उन्हें खत्म करने के पक्ष में है; दूसरी ओर, मध्यमार्गी नेता जो अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों और शहरी वोट बैंक को ध्यान में रखकर नीति पर कायम रहना चाहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबे समय तक जारी रहा, तो पार्टी की एकजुटता और चुनावी संभावनाओं दोनों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।