बच्चों में बढ़ती नकारात्मक सोच चिंता का विषय: कैलाश सत्यार्थी

परिवार और स्कूल की भूमिका सबसे अहम, गैजेट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल पर जताई चिंता

बच्चों में बढ़ती नकारात्मक सोच चिंता का विषय: कैलाश सत्यार्थी

नई दिल्ली। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों में बढ़ती नकारात्मक सोच और मानसिक दबाव पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज के समय में तकनीक और गैजेट्स तक बच्चों की आसान पहुंच जहां ज्ञान के विस्तार में मदद कर रही है, वहीं इसके दुरुपयोग से बच्चों के कोमल मन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

अमर उजाला के न्यूजरूम में बातचीत के दौरान सत्यार्थी ने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल तकनीक नहीं, बल्कि राजनीति और व्यापार से भी जुड़े हुए हैं। बच्चों के लिए उपलब्ध कई तरह की सामग्री उनके मानसिक विकास के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने विशेष रूप से ऑनलाइन माध्यमों पर बढ़ते बाल यौन शोषण को सबसे गंभीर चिंता बताया।

उन्होंने कहा कि गैजेट्स के अत्यधिक उपयोग के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि माता-पिता बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता नहीं बना पाते। “अगर परिवार में बच्चों की बात सुनने का माहौल नहीं होगा, तो वे गैजेट्स में ही सुकून ढूंढेंगे और धीरे-धीरे नकारात्मकता का शिकार होते चले जाएंगे,” उन्होंने कहा।

शिक्षा व्यवस्था भी बढ़ा रही हीनभावना

पढ़ाई के बढ़ते दबाव और प्रतिस्पर्धा पर बात करते हुए सत्यार्थी ने कहा कि देश में शिक्षा व्यवस्था कई स्तरों में बंटी हुई है, जिससे बच्चों के बीच भेदभाव और अलगाव की भावना पैदा होती है। इससे हीनभावना और खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता पनपती है, जो स्कूल के दिनों से शुरू होकर कॉलेज तक और गहरी हो जाती है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि स्कूलों का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां बच्चे एक-दूसरे की मदद करना, सम्मान देना और सहयोग करना सीखें, न कि केवल प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की दौड़ में उलझे रहें।

नोबेल शांति पुरस्कार पर ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नोबेल शांति पुरस्कार की मांग को लेकर सत्यार्थी ने हल्के-फुल्के अंदाज में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने इस पुरस्कार को इतना चर्चा में ला दिया कि दुनिया भर में इसके प्रति लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई। “अब लोग यह मानने लगे हैं कि नोबेल शांति पुरस्कार की चयन प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष है,” उन्होंने कहा।

पुरस्कार को राष्ट्र को समर्पित करने की कहानी

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद के अनुभव साझा करते हुए सत्यार्थी ने बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस सम्मान से बेहद भावुक हो गए थे। परिवार से विचार-विमर्श के बाद उन्होंने यह पुरस्कार राष्ट्र को समर्पित करने का निर्णय लिया। इसके लिए कोई पूर्व प्रोटोकॉल नहीं था, लेकिन बाद में विशेष व्यवस्था कर यह पुरस्कार राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में रखा गया।

सत्यार्थी ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे देश का है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए।