जब पूरी दुनिया इज़राइल और ईरान के बीच छिड़े अचानक युद्ध पर नजरें टिकाए थी, तब एक चुपचाप लेकिन चालाक खिलाड़ी—रूस—पर्दे के पीछे से अपनी भूमिका तय कर रहा था।
विश्लेषकों का कहना है कि रूसअतीत में भी वैश्विक संकटों का फायदा उठाकर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाता रहा है। और इस बार भी, मध्य पूर्व में मिसाइल हमलों की बारिश के बीच रूस ने खुद को शांति-दूत और जिम्मेदार ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की।
पुतिन की रणनीति: शांतिदूत की छवि के पीछे का राजनीतिक खेल
एक ओर जहां इज़राइल और ईरान के बीच तीव्र मिसाइल हमले शुरू हुए और हालात "विश्व युद्ध 3" जैसे नजर आने लगे, वहीं अमेरिका को भी हस्तक्षेप कर इज़राइल की हवाई रक्षा में सहायता करनी पड़ी। अमेरिका ने हालात को कूटनीतिक तरीके से संभालने के प्रयास में B-2 स्टील्थ बॉम्बर हमला भी किया।
लेकिन इसी बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अलग ही चाल चली। उन्होंने इस संकट का फायदा उठाते हुए खुद को "परिपक्व" नेता और "संघर्ष से ऊपर" दिखाने की कोशिश की—जबकि असल में रूस इस समय यूक्रेन पर अपने आक्रमण को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है।
यूक्रेन संकट से ध्यान भटकाने की कोशिश
फाउंडेशन फॉर डिफेन्स ऑफ डेमोक्रेसीज़ की शोधकर्ता डॉ. इवाना स्ट्राडनर का मानना है कि यह रूस की पुरानी रणनीति है। उन्होंने कहा, “रूस कभी भी किसी संकट को भुनाने का मौका नहीं छोड़ता। मौजूदा मध्य पूर्व संकट का फायदा उठाकर रूस पश्चिमी देशों का ध्यान यूक्रेन से हटाने की कोशिश कर रहा है।”
विश्लेषकों का मानना है कि रूस इस झगड़े को अपनी छवि सुधारने के मौके के तौर पर देखता है, जिससे वह पश्चिमी देशों की आलोचना से बच सके और अमेरिकी प्रतिक्रिया की सीमाओं को परखे।