हिंदी गौरव न्यूज डेस्क | जून 2025
बाल्टिक सागर में समुद्र की गहराई में बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों पर रूस और चीन की संदिग्ध 'ग्रे ज़ोन' गतिविधियों ने वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। ये केबलें केवल इंटरनेट और टेलीफोन नेटवर्क ही नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों और सैन्य संचार के लिए भी जीवनरेखा हैं। लेकिन अब ये गंभीर खतरे की चपेट में हैं।
नाटो (NATO) देशों ने इन खतरों से निपटने के लिए शीत युद्ध के बाद सबसे बड़ा समुद्री जवाबी अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य समुद्र के भीतर हो रही तोड़फोड़ और गुप्त अभियानों की निगरानी और रोकथाम करना है।
‘ग्रे ज़ोन’ रणनीति में सैन्य ताकत का खुलेआम उपयोग किए बिना ऐसे गुप्त और भ्रमित करने वाले अभियान चलाए जाते हैं जो शत्रु राष्ट्र की सुरक्षा और संचार तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। रूस और चीन पर आरोप है कि वे पश्चिमी देशों की समुद्री केबलों की निगरानी और तोड़फोड़ में शामिल हैं, जिनका प्रमाण हाल ही में बाल्टिक क्षेत्र में देखने को मिला है।
बाल्टिक सागर, जो कई यूरोपीय देशों की सीमाओं से सटा हुआ है, वहां हाल ही में अनक्रूड (बिना चालक) समुद्री जहाज़ों और अज्ञात उपकरणों की मौजूदगी पाई गई। नाटो खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ये उपकरण संभावित रूप से फाइबर-ऑप्टिक केबल्स की जांच या क्षति पहुंचाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं।
विश्व के 95% से अधिक अंतरराष्ट्रीय डेटा का आदान-प्रदान समुद्र के नीचे बिछी इन केबलों के माध्यम से होता है। यदि इन पर हमला होता है, तो बैंकिंग, स्टॉक मार्केट, सैन्य संचार और वैश्विक इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
नाटो ने क्षेत्र में विशेष पनडुब्बी निगरानी ड्रोन, गश्ती जहाज़ और समुद्री खुफिया नेटवर्क तैनात कर दिए हैं। इस कार्रवाई को शीत युद्ध के बाद सबसे बड़ा समुद्री निगरानी और सुरक्षा अभियान माना जा रहा है।
रूस और चीन की इस संदिग्ध गतिविधि ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा ढांचे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नाटो और पश्चिमी देश अब इस चुनौती का जवाब देने के लिए नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या इस डिजिटल युद्ध से दुनिया की संप्रभुता और सुरक्षा बचाई जा सकेगी।