राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सेवा के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि सेवा किसी पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। उन्होंने निस्वार्थ भाव से किए गए कार्यों को ही सच्ची सेवा बताते हुए स्वार्थ, भय और दिखावे से प्रेरित सेवा पर सवाल उठाए।
रविवार को नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि सेवा का मूल भाव अपने स्वार्थ को त्यागकर दूसरों के लिए कार्य करना है। जब व्यक्ति सेवा करता है, तो वह केवल दूसरों की मदद ही नहीं करता, बल्कि अपने भीतर की कमजोरियों और विकारों को भी दूर करने का प्रयास करता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में सेवा कार्यों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी दिखाई देती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर सेवा निस्वार्थ भावना से की जा रही हो। कई बार लोग किसी निजी लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा या विशेष परिस्थितियों के चलते सेवा में जुटते हैं।
भागवत ने इशारों में कहा कि चुनावी समय में सेवा गतिविधियां अधिक दिखाई देती हैं, लेकिन बाद में वही उत्साह कम हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि स्वार्थ से प्रेरित सेवा लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होती। जैसे ही व्यक्ति का उद्देश्य पूरा होता है, वह सेवा कार्यों से दूर हो जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि डर, दबाव या मजबूरी में की गई सेवा का प्रभाव सीमित होता है। सच्ची सेवा वही है, जो बिना किसी लालच, भय या दिखावे के की जाए और जिसका उद्देश्य समाज का वास्तविक कल्याण हो।
अंत में उन्होंने समाज के सभी वर्गों से आह्वान किया कि वे सेवा को अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनाएं और इसे कर्तव्य के रूप में निभाएं, तभी समाज में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन संभव है।