कैनबरा, 4 सितंबर 2025 – ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में इन दिनों भारतीय प्रवासी समुदाय को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। लिबरल पार्टी की वरिष्ठ नेता और उत्तरी क्षेत्र से सीनेटर जैसिंटा नाम्पिजिन्पा प्राइस ने यह दावा कर हलचल मचा दी कि लेबर सरकार बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासियों को आने दे रही है ताकि उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सके। इस बयान ने न केवल लेबर को आक्रामक बना दिया है बल्कि खुद लिबरल पार्टी के भीतर भी मतभेद पैदा कर दिए हैं।
लेबर सरकार ने प्राइस के बयान को नकारते हुए भारतीय समुदाय के प्रति समर्थन जाहिर किया। बहुसांस्कृतिक मामलों की मंत्री ऐनी एली ने संसद में कहा कि भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को अपने इस देश में रहने का औचित्य साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
उन्होंने कहा,
“हम आपको जानते हैं, हम आपकी कद्र करते हैं और ऑस्ट्रेलिया के लिए आपके योगदान को धन्यवाद देते हैं। भारतीय समुदाय ने हमारे समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीति में अमूल्य योगदान दिया है।”
एली ने यह भी कहा कि पिछले हफ्ते हुए एंटी-माइग्रेशन प्रदर्शनों के बाद भारतीय समुदाय में असुरक्षा की भावना पनपी है और राजनीतिक नेताओं की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ इस डर को और बढ़ा रही हैं।
विपक्ष की नेता सुस्सन लेय ने भी इस बयान से स्पष्ट रूप से दूरी बना ली। उन्होंने कहा कि लिबरल पार्टी को प्रवासी समुदायों का भरोसा फिर से जीतना है और ऐसे बयानों से कोई मदद नहीं मिलने वाली। लेय का यह कदम साफ संकेत है कि लिबरल पार्टी प्रवासी विरोधी छवि से बाहर निकलना चाहती है।
विवाद बढ़ने पर सीनेटर प्राइस ने कहा कि उन्होंने केवल यह तथ्य रखा था कि भारतीय प्रवासी अब ऑस्ट्रेलिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समूह हैं और जल्द ही सबसे बड़ा समुदाय बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनका मकसद केवल यह जताना था कि “मास माइग्रेशन” के कारण ऑस्ट्रेलियाई परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ रहा है।
जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या वे अपने बयान के लिए माफी मांगेंगी, तो उन्होंने कहा –
“मुझे माफी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है।”
हालाँकि इंटरव्यू के तुरंत बाद उन्होंने एक बयान जारी कर यह भी जोड़ा कि ऑस्ट्रेलिया की प्रवासन नीति लंबे समय से गैर-भेदभावपूर्ण और द्विदलीय सहमति पर आधारित रही है।
इस पूरे विवाद के बीच, सीनेटर प्राइस तब और सुर्खियों में आ गईं जब उन्होंने संसद में राष्ट्रीय ध्वज दिवस के मौके पर ऑस्ट्रेलियाई झंडा पहनकर प्रवेश किया। उन्होंने मांग की कि झंडे के अपमान को अपराध की श्रेणी में रखा जाए। संसद में इस कदम पर भी मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली।
भारतीय प्रवासी समुदाय को लेकर उठे इस विवाद ने ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्रवासन नीतियों को लेकर राजनीतिक दल किस तरह के संदेश दे रहे हैं। लेबर ने जहां प्रवासी समुदाय के समर्थन में खुलकर बयान दिए, वहीं लिबरल पार्टी की नेता सुस्सन लेय ने भी विवादित टिप्पणी से दूरी बना ली। लेकिन सीनेटर प्राइस का रुख साफ करता है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमा सकता है।