ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थाएं इस वर्ष वैश्विक रैंकिंग में पिछड़ गई हैं। QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2025 के अनुसार, देश के कई शीर्ष विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गई है, जिसे विशेषज्ञों और विपक्ष ने "चिंताजनक और अस्वीकार्य" बताया है।
हालांकि इस गिरावट के बावजूद, ऑस्ट्रेलिया अभी भी वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षा के लिए पांचवें स्थान पर बना हुआ है। यह स्थिति केवल हांगकांग, सिंगापुर, स्वीडन और स्विट्जरलैंड जैसे देशों के बाद आती है – जहां जनसंख्या अनुपात के हिसाब से अधिक टॉप 100 विश्वविद्यालय हैं।
शीर्ष विश्वविद्यालयों की स्थिति में बदलाव:
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मेलबर्न विश्वविद्यालय: 13वें स्थान से खिसककर अब 19वें पर
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सिडनी विश्वविद्यालय: 18वें से 25वें
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ANU (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी): 30वें से 32वें
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NSW विश्वविद्यालय: 19वें से 20वें
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मोनाश विश्वविद्यालय: 37वें से उठकर 36वें
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क्वींसलैंड विश्वविद्यालय: 40वें से 42वें
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UWA (पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय): 77वें पर यथावत
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एडिलेड विश्वविद्यालय (नया विलय संस्थान): पहली बार 82वें स्थान पर
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UTS (सिडनी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय): 88वें से गिरकर 96वें
विपक्ष का आरोप: सरकार नाकाम
संघीय विपक्ष के शिक्षा प्रवक्ता जोनो डुनियम ने इस गिरावट पर नाराज़गी जताते हुए कहा कि, “सरकार को यह समझना होगा कि यह लगातार गिरावट उच्च शिक्षा क्षेत्र की उपेक्षा का परिणाम है। हमें ऐसे नीतिगत और वित्तीय समाधान चाहिए जो हमारे विश्वविद्यालयों को फिर से विश्व-स्तर पर ला सकें।”
उन्होंने आगे कहा, “शिक्षा में निवेश का मतलब केवल धन देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि छात्र और करदाता दोनों को इसका उपयुक्त लाभ मिले।”
स्टाफ-टू-स्टूडेंट अनुपात में गिरावट
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि करीब 70% ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित शिक्षकों और छात्रों के अनुपात में गिरावट आई है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ा है।
नवीनता की जरूरत
शिक्षाविदों का मानना है कि केवल रैंकिंग सुधारना ही उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुसार ढालना चाहिए, ताकि स्नातक युवा वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
निष्कर्ष:
ऑस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग में गिरावट केवल संख्या नहीं, बल्कि नीति, गुणवत्ता और प्राथमिकता की कमी को दर्शाती है। यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह गिरावट भविष्य की पीढ़ियों और देश की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती है।