कैनबरा।
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने आयात पर लगने वाले सैकड़ों छोटे-छोटे शुल्कों को खत्म करने का ऐलान किया है। कोषाध्यक्ष जिम चाल्मर्स ने इन शुल्कों को “न्यूज़ेंस टैरिफ़” यानी बेकार बाधा करार देते हुए कहा कि ये न तो सरकारी खज़ाने के लिए कोई बड़ी आय का स्रोत हैं और न ही स्थानीय उद्योग के लिए कोई सुरक्षा कवच। बल्कि इनसे आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन शुल्कों को हटाने से रोज़मर्रा की कई वस्तुएँ और मशीनरी सस्ती होगी। इससे खुदरा बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और आम परिवारों के खर्च का दबाव कम होगा। चाल्मर्स का कहना है कि सरकार का लक्ष्य है महंगाई को नियंत्रण में रखना और आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करना।
चाल्मर्स का यह बयान केवल घरेलू नीति तक सीमित नहीं है। राजनीतिक हलकों में इसे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ़ नीति पर अप्रत्यक्ष हमला माना जा रहा है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल में "अमेरिका फर्स्ट" के नारे के तहत बड़े पैमाने पर आयात शुल्क लगाए थे। चाल्मर्स ने कहा, “मुक्त व्यापार के रास्ते में खड़ी हर रुकावट अधिक नुकसान करती है, लाभ नहीं।” यह टिप्पणी साफ इशारा करती है कि ऑस्ट्रेलिया अब संरक्षणवाद (Protectionism) की बजाय खुले और सहयोगात्मक व्यापार मॉडल पर ज़ोर देगा।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि इस कदम से ऑस्ट्रेलिया का वैश्विक निवेशकों के बीच विश्वास और बढ़ेगा। “जब किसी देश की नीति व्यापार को आसान बनाती है तो अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ वहीं निवेश करना पसंद करती हैं,” एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने कहा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि टैरिफ़ हटने से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया और भी आकर्षक बाज़ार बन सकता है।
हालाँकि, विपक्षी दलों ने इस फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। कुछ नेताओं ने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आयात शुल्क हटाने से घरेलू उद्योगों को नुकसान न पहुँचे। उनका तर्क है कि बिना किसी सुरक्षा के विदेशी कंपनियाँ बाज़ार पर हावी हो सकती हैं।