एच-1बी वीज़ा नियमों पर ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, भारत में सियासत गरमाई

ओवैसी का मोदी सरकार पर निशाना, आईटी उद्योग ने राहत की सांस ली

एच-1बी वीज़ा नियमों पर ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, भारत में सियासत गरमाई

ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट की शर्तें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एच-1बी वीज़ा को लेकर उद्योग और पेशेवरों के बीच फैली अनिश्चितताओं को दूर कर दिया है। प्रशासन ने साफ किया है कि वीज़ा शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी केवल नए आवेदनों पर लागू होगी।
मौजूदा वीज़ा धारकों और उनके नवीनीकरण पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इस फैसले से उन हजारों भारतीय पेशेवरों को राहत मिली है जो पहले यह सोचकर चिंतित थे कि क्या उनकी नौकरी और वीज़ा नवीनीकरण पर भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जाएगा।

नए प्रावधानों के तहत एच-1बी आवेदन पर अब एकमुश्त 1,00,000 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क देना होगा, जबकि सामान्य शुल्क 2,000 से 5,000 डॉलर के बीच होता है। यह बढ़ोतरी अमेरिका में काम करने की आकांक्षा रखने वाले कई नए भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।


ओवैसी का मोदी सरकार पर सीधा हमला

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि एच-1बी वीज़ा का 71 प्रतिशत हिस्सा भारतीयों को मिलता है, इसलिए इस निर्णय का सीधा असर भारत के लाखों युवाओं पर पड़ेगा।
ओवैसी ने सवाल उठाते हुए कहा:

“मुझे ट्रंप प्रशासन से शिकायत तो है, लेकिन सबसे बड़ी शिकायत मोदी सरकार से है, जिसने भारतीय युवाओं के हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस रणनीति तैयार नहीं की। भारतीय आईटी सेक्टर और नौजवान पेशेवरों की चिंताओं पर केंद्र सरकार चुप क्यों है?”

ओवैसी के तीखे सवालों ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति और आर्थिक कूटनीति को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है।


नैसकॉम और उद्योग जगत की प्रतिक्रिया

भारत की प्रमुख आईटी उद्योग संस्था नैसकॉम (NASSCOM) ने ट्रंप प्रशासन की इस स्पष्टता का स्वागत किया है। संगठन का कहना है कि इससे बिज़नेस कंटिन्युटी बनी रहेगी और मौजूदा वीज़ा धारकों की चिंता काफी हद तक दूर हो गई है।

नैसकॉम ने यह भी बताया कि भारतीय कंपनियां पिछले कुछ वर्षों से एच-1बी वीज़ा पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं और स्थानीय स्तर पर नियुक्तियों को बढ़ावा दे रही हैं। इससे अमेरिकी नीतियों में बदलाव का असर अब पहले की तुलना में बहुत कम होगा। संगठन के अनुसार, इस कदम से भारतीय आईटी उद्योग पर केवल सीमित और मामूली प्रभाव पड़ेगा।


भारतीय आईटी उद्योग ने ली राहत की सांस

भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों के बीच इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। जहां नए आवेदकों को अतिरिक्त शुल्क की चिंता सता रही है, वहीं मौजूदा कर्मचारियों ने चैन की सांस ली है।
उद्योग जगत का मानना है कि यह कदम भारतीय आईटी उद्योग के लिए किसी बड़े झटके जैसा नहीं है, बल्कि यह केवल उन लोगों को प्रभावित करेगा जो पहली बार आवेदन कर रहे हैं।


भारत-अमेरिका संबंधों पर असर?

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप प्रशासन का यह फैसला भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों पर बड़ा झटका नहीं है। भारत की कंपनियां अब स्थानीय स्तर पर नौकरियां पैदा करने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को स्थिरता मिल सकती है।
हालांकि, राजनीतिक स्तर पर ओवैसी जैसे नेताओं की आलोचना ने यह संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा भारतीय राजनीति में भी गूंज सकता है।