इस्लामाबाद/संयुक्त राष्ट्र।
पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कड़ी चिंता जताई है। हाल ही में धार्मिक त्योहारों और जुलूसों के दौरान कई स्थानों पर हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें मंदिरों, चर्चों और अल्पसंख्यक समुदायों के घरों को निशाना बनाया गया।
विशेषज्ञों ने पाकिस्तान सरकार से अपील की है कि वह देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और ऐसे हिंसक हमलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में लागू ईश निंदा कानून (Blasphemy Law) अब मानवाधिकारों के उल्लंघन का उपकरण बन चुका है, जिसका इस्तेमाल विशेषकर हिंदू, ईसाई, सिख और अहमदिया समुदायों के खिलाफ हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार,
"पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर किया जा रहा अत्याचार न केवल मानवता के खिलाफ अपराध है, बल्कि यह देश की सामाजिक एकता के लिए भी गंभीर खतरा है।"
पाकिस्तान में ईश निंदा कानून के तहत किसी पर आरोप लगते ही उग्र भीड़ न्याय अपने हाथ में ले लेती है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां किसी भी साक्ष्य के बिना ही भीड़ ने अल्पसंख्यकों पर हमला कर दिया — कई बार जान तक ले ली गई।
मानवाधिकार रिपोर्ट्स के अनुसार:
2024 में 150 से अधिक ईश निंदा के मामले दर्ज हुए।
इनमें से अधिकांश आरोप अल्पसंख्यकों पर लगे।
कई बार झूठे आरोप व्यापारिक विवादों या निजी दुश्मनी के चलते लगाए गए।
भारत ने कई बार इन घटनाओं पर चिंता जताई है और पाकिस्तान से धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने की अपील की है। अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान को चेताया है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।