ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी हाइपरसोनिक मिसाइल की तैनाती पर चीन का तीखा विरोध

ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी हाइपरसोनिक मिसाइल की तैनाती पर चीन का तीखा विरोध

कैनबरा/बीजिंग। ऑस्ट्रेलिया में अमेरिका द्वारा अपने नए प्रोटोटाइप हाइपरसोनिक मिसाइल सिस्टम की तैनाती ने चीन की नाराज़गी को भड़का दिया है। चीन ने आरोप लगाया है कि ऑस्ट्रेलिया, वॉशिंगटन की इंडो-पैसिफिक रणनीति का "औज़ार" बन चुका है और अब सीधे अमेरिकी सामरिक हथियारों का मंच भी बन रहा है।

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी क्षेत्र (Northern Territory) में हाल ही में आयोजित ‘टैलिस्मन सेबर 2025’ बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास के दौरान अमेरिका ने पहली बार अपनी नई "डार्क ईगल लॉन्ग रेंज हाइपरसोनिक वेपन" (LRHW) को महाद्वीपीय सीमा के बाहर तैनात किया। इस मिसाइल को अमेरिकी सेना "गेम-चेंजर" बता रही है।

अभ्यास के तहत अमेरिका ने दो मोबाइल मिसाइल लांचरों को विशाल सैन्य विमान के ज़रिए ऑस्ट्रेलिया भेजा, जिन्हें गुप्त स्थानों पर सड़क मार्ग से पहुँचाया गया। यह मिसाइल लगभग 2,800 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकती है और ध्वनि की गति से पाँच गुना (मैक 5) से अधिक गति प्राप्त करती है। इसका मतलब है कि यह ऑस्ट्रेलिया से चीन के दक्षिण चीन सागर में बने सैन्य ठिकानों तक आधे घंटे से भी कम समय में पहुँच सकती है।

चीन की प्रतिक्रिया
चीन के रणनीतिक विश्लेषकों ने इसे अमेरिका की "सैन्य ताकत का प्रदर्शन" करार दिया है। शंघाई फुदान विश्वविद्यालय के रणनीतिकार शिन चियांग ने कहा, “इससे चीन-अमेरिका के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य प्रतिस्पर्धा और तेज़ होगी।”

पूर्व चीनी सैन्य अधिकारी और वर्तमान में थिंघुआ विश्वविद्यालय से जुड़े झोउ बो ने डार्क ईगल की अहमियत को नकारते हुए कहा कि चीन के पास पहले से बेहतर हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, जैसे कि 2019 से सेवा में मौजूद DF-17 और इससे भी अधिक दूरी तक मार करने वाली DF-27

रणनीतिक पृष्ठभूमि
इस तैनाती का समय भी संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि अभ्यास के दौरान ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ बीजिंग दौरे पर थे। चीन का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया की कूटनीति और रक्षा नीति में "स्पष्ट अंतर" दिख रहा है—जहाँ एक तरफ संवाद और आर्थिक जुड़ाव की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ सैन्य मोर्चे पर अमेरिका के साथ क़रीबी बढ़ रही है।

टैलिस्मन सेबर युद्धाभ्यास में इस बार 19 देशों के 40,000 सैनिक, नाविक और वायुसेनानी शामिल हुए। जापान और फ़िलीपींस जैसे देश पहले से ही चीन के आक्रामक समुद्री दावों से जूझ रहे हैं, और अमेरिका के साथ उनकी सैन्य साझेदारी को बीजिंग संदेह की नज़र से देखता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डार्क ईगल जैसी तैनाती, अमेरिका और उसके सहयोगियों की "फ़र्स्ट आइलैंड चेन" (जापान से पापुआ न्यू गिनी तक फैला द्वीप समूह) पर सामरिक पकड़ मज़बूत करने की रणनीति का हिस्सा है—वहीं चीन इस पूरे क्षेत्र को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है।